पेंडोरा पेपर्स लीक मामला

वर्तमान समय में विदेशों में ट्रस्ट स्थापित करने का कारण और इसके प्रभाव तथा सरकार द्वारा इस सम्बन्ध में किये, किये जा रहे कार्य, चर्चा में क्यों हैं? यह सवाल स्वाभाविक है। हाल ही में ‘पेंडोरा पेपर्स लीक प्रकरण’ में अनेक प्रमुख भारतीयों के नाम सामने आये हैं और इसमें तीन सौ पचास से अधिक भारतीय नाम शामिल हैं; जिनमें 60 से अधिक ख्याति प्राप्त लोग हैं। वास्तव में ‘पेंडोरा पेपर्स’ 14 वैश्विक कॉर्पोरेट सेवा फर्मों की 11.9 मिलियन सार्वजनिक (लीक) हो चुकी फाइलें हैं; जिन्होंने लगभग 29 हजार ऑफ-द-शेल्फ कम्पनियों और निजी ट्रस्टों की स्थापना किया था। ऐसे ‘ट्रस्ट’ को एक प्रत्ययी (निकटवर्ती साहचर्य) व्यवस्था के रूप में वर्णित किया जा सकता है; जहाँ एक तृतीय पक्ष, जिसे ट्रस्टी के रूप में सन्दर्भित किया जाता है, व्यक्तियों या संगठनों की ओर से सम्पत्ति धारित करता है। इन ट्रस्टों की अपनी कोई अलग से कानूनी इकाई नहीं होती है; इसकी कानूनी प्रकृति \’ट्रस्टी\’ में निहित होती है। कभी-कभी, \’सेटलर\’ (छिपे तौर से ट्रस्ट का सर्वेसर्वा) एक ‘संरक्षक\’ की नियुक्ति करता है, जिसके पास ट्रस्टी की निगरानी करने की शक्ति होती है और वह ट्रस्टी को हटाकर  नयी नियुक्ति भी कर सकता है। भारतीय कानून, भारतीय ट्रस्ट अधिनियम 1882, ट्रस्ट की अवधारणा को कानूनी आधार प्रदान करता है। भारतीय कानून, ट्रस्ट को लाभार्थियों के लाभ हेतु सम्पत्ति का प्रबन्धन और उपयोग करने के लिये ट्रस्टी के दायित्व के रूप में मान्यता देते हैं। भारत ‘ऑफशोर’ (जबाबदेही रहित) ट्रस्टों को भी मान्यता देता है। ऑफ-द-शेल्फ\’ (जिसका कोई व्यवस्थित रिकार्ड नहीं है) या पूर्वनिर्मित कम्पनी एक पूर्व-पंजीकृत लिमिटेड कम्पनी है; जो कि अभी तक (लीक हो जाने तक) अपना कारोबार शुरू नहीं किया होता है। एक \’ऑफ-द-शेल्फ\’ कम्पनी तत्काल उपयोग के लिये तैयार होती है और एक निश्चित लागत का भुगतान करने के बाद इसे आसानी से खरीदा जा सकता है।

‘पेंडोरा पेपर्स लीक’ से पता चलता है कि व्यापारिक परिवारों और अति-समृद्ध व्यक्तियों द्वारा निवेश एवं अन्य सम्पत्तियों को रखने के उद्देश्य से ऑफशोर कम्पनियों के साथ ट्रस्ट का उपयोग किया जा रहा है। ट्रस्ट को प्रायः ‘टैक्स हेवन’ में स्थापित किया जा सकता है, जो सापेक्ष कर लाभ (करों में छूट) प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिये- समोआ, बेलीज, पनामा और ब्रिटिश वर्जिन द्वीप समूह। यह लीक बताती है कि किस प्रकार अमीरों ने सम्पत्ति नियोजन के लिये ऐसे क्षेत्राधिकारों में जटिल बहु-स्तरित ट्रस्ट संरचनाओं की स्थापना किया, जहाँ कर सम्बन्धी कानून तो काफी जटिल नहीं थे; लेकिन वहाँ गोपनीयता कानून काफी सख्त हैं। विभिन्न देशों द्वारा मनी लॉन्ड्रिंग, आतंकवाद के वित्तपोषण और कर चोरी की बढ़ती चिन्ताओं के बीच ‘ऑफ-शोर संस्थाओं’ पर अपने कानूनों को कड़ा किया गया है। लेकिन इस \’पेंडोरा पेपर लीक\’ से पता चलता है कि धन्धेबाजों द्वारा अभी भी \’बिलो द टेबल\’ इन माध्यमों का प्रयोग किया जा रहा है। जैसा कि विदित है कि ‘पनामा’ और ‘पैराडाइज़’ पेपर्स लीक भी व्यापक पैमाने पर व्यक्तियों एवं निगमों द्वारा स्थापित ‘ऑफ-शोर’ संस्थाओं से ही सम्बन्धित रहे हैं। विदेशों में ट्रस्ट स्थापित करने का मुख्य कारण अपनी अबैध सम्पत्ति को गोपनीयता प्रदान करने की होती है। विदेशी ट्रस्ट अपने क्षेत्राधिकार में कड़े गोपनीयता कानूनों के कारण महत्त्वपूर्ण गोपनीयता प्रदान करते हैं और दूसरे देश के अबैध तरीके से धन रखने की चाहत वाले इसका लाभ उठाते हैं।

परिणाम यह होता है कि एक देश का रुपया, दूसरे देश के लोगों की तरक्की के काम आता है। इस प्रकार के व्यवसायियों द्वारा (जिन्हें धन्धेबाज कहना चाहिये) निजी ‘ऑफ-शोर’ ट्रस्टों की स्थापना का मूल उद्देश्य स्वयं को अपनी अवैध सम्पत्ति से अलग करना और दिखाना है। ऐसे धन्धेबाज अपनी सम्पत्ति से होने वाली आय पर कर देने से बचने के लिये सभी सम्पत्तियों को एक ट्रस्ट में स्थानान्तरित कर देते हैं। ऐसे धन्धेबाजों को प्रायः यह डर रहता है कि ‘सम्पत्ति शुल्क’, जिसे वर्ष 1985 में समाप्त कर दिया गया था, को जल्द ही फिर से प्रस्तुत किया जा सकता है। इस तरह ट्रस्ट की स्थापना से भविष्य में स्वयं और आने वाली पीढ़ी को कर का भुगतान करने से बचाया जा सकता है। ऐसे ट्रस्ट पूँजी नियन्त्रित अर्थव्यवस्था में लचीलेपन का अवसर प्रदान करते हैं। इसी लचीलेपन का लाभ धन्धेबाज उठाते हैं। अपना देश भारत एक पूँजी नियन्त्रित अर्थव्यवस्था वाला देश है। भारतीय रिजर्व बैंक की उदारीकृत प्रेषण योजना के अन्तर्गत एक व्यक्ति प्रतिवर्ष केवल 2,50,000 अमेरिकी डॉलर का ही निवेश कर सकता है। इस स्थिति पर नियन्त्रण पाने के लिये धन्धेबाजों ने अनिवासी भारतीयों की ओर रुख किया है; क्योंकि ‘विदेशी मुद्रा प्रबन्धन अधिनियम, 1999’ के अन्तर्गत अनिवासी भारतीय भारत के बाहर अपनी वर्तमान वार्षिक आय के अलावा प्रतिवर्ष एक मिलियन अमेरिकी डॉलर भेज सकते हैं। इसके अलावा विदेशी क्षेत्राधिकार में कर की दर, भारत में 30 प्रतिशत व्यक्तिगत आयकर दर से बहुत कम है।

भारतीय कराधान प्रणाली में कुछ अस्पष्टता दुरूहता एवं कठोरता है; जहाँ आयकर विभाग ‘ऑफ-शोर’ ट्रस्टों का मुकाबला करने में सक्षम नहीं है। अघोषित विदेशी आय और सम्पत्ति से सम्बन्धित \’कालाधन\’ तथा \’कर अधिरोपण अधिनियम 2015’ के लागू होने के बाद से निवासी भारतीयों को अपने विदेशी वित्तीय हितों एवं सम्पत्ति की रिपोर्टिंग करनी होती है; जबकि अनिवासी भारतीयों के लिये यह अनिवार्य नहीं होता है। यदि ट्रस्टी एक भारतीय निवासी है, तो आयकर विभाग कराधान उद्देश्यों के लिये एक ‘ऑफ-शोर’ ट्रस्ट को भारत का निवासी मान सकता है। ऐसे मामलों में जहाँ ट्रस्टी एक ‘ऑफ-शोर’ इकाई या एक अनिवासी भारतीय है और कर विभाग यह स्थापित करता है कि ट्रस्टी एक निवासी भारतीय से निर्देश ले रहा है, तो भी ट्रस्ट को कराधान उद्देश्यों के लिये भारत का निवासी माना जा सकता है। जहाँ तक इस विसंगति को रोकने का विषय है; इस सम्बन्ध में अनेक नियम कानून और सरकारी प्रयास हुए हैं; लेकिन यह लीक प्रकरण प्रमाणित करता है कि अभी सफलता नहीं मिली है। अन्तर्राष्ट्ररीय स्तर पर दोहरा कराधान अपवंचन समझौते; भारतीय दोहरा कराधान अपवंचन समझौतों तथा कर सूचना विनिमय समझौतों, बहुपक्षीय सम्मेलनों के तहत सूचनाओं के आदान-प्रदान को सुविधाजनक बनाने और बढ़ाने के उद्देश्य से विदेशी सरकारों के साथ सक्रिय रूप से जुड़ रहा है; किन्तु आगे परिणाम क्या होता, देखना शेष है।

भारत सूचना के स्वचालित आदान-प्रदान और वित्तीय जानकारी के सक्रिय साझाकरण के लिये एक बहुपक्षीय शासन बनाने के प्रयासों में अग्रणी रहा है; जो कर चोरी से निपटने के वैश्विक प्रयासों में सहायता करता है। संयुक्त राज्य अमेरिका का विदेशी खाता कर अनुपालन अधिनियम के अन्तर्गत भारत ने इस अधिनियम के तहत संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ वित्तीय सूचना साझा करने हेतु समझौता किया है। विदेश में छुपाये गये धन से सम्बन्धित लाखों दस्तावेज लीक होने के बाद पेंडोरा पेपर्स सुर्खियों में आया है। जैसा कि ऊपर वर्णित है, विदेशी टैक्स हेवन में 14 कम्पनियों के 11.9 मिलियन लीक हुए पेपर हैं; जिसमें 29 हजार विदेशी कम्पनियों और वियतनाम, बेलीज, सिंगापुर जैसे देशों के ट्रस्टों के स्वामित्व का विवरण शामिल है। ये दस्तावेज निजी विदेशी ट्रस्टों में सम्पत्ति के स्वामित्व को उजागर करते हैं और विदेशी संस्थाओं द्वारा नकद, शेयरहोल्डिंग और रियल एस्टेट सम्पत्तियों जैसे निवेशों को रखा जाता है। इस मामले में लगभग 350 भारतीय लोगों के नाम शामिल हैं। लीक करने वाले प्रकाशन घरानों और इण्टरनेशनल कंसोर्टियम ऑफ इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म के एक वैश्विक नेटवर्क ने 11.9 मिलियन लीक हुए दस्तावेजों की जाँच के लिये दो साल तक कार्य किया। प्रतिष्ठित मीडिया क्षेत्र के लगभग 600 पत्रकार चल रही इस जाँच का हिस्सा हैं। कागजों की जाँच से पता चलता है कि कैसे लोगों ने सम्पत्ति योजना के लिये एक जटिल बहुस्तरीय ट्रस्ट संरचना स्थापित किया है तथा कैसे भारत में फिल्मी, खेल, व्यवसाय, राजनीति के क्षेत्र में वर्षों से हस्ती कहे जाने वाले अनेक लोगों ने देश के साथ कैसा धोखा एवं गद्दारी किया है! ऐसे लोगों ने देश को तथा जनता की भावनाओं के साथ ठगी किया है।

डॉ कौस्तुभ नारायण मिश्र

(यह लेख \’यथावत, नयी दिल्ली के 01- 15 अक्टूबर 2021 के अंक में प्रकाशित है।)