दुनिया में कोरोना और कारतूस का आतंक

 

कोरोना महामारी की तीसरी लहर कितनी दूर है, यह यक्ष प्रश्न अब भी किसी न किसी रूप में खड़ा है? दुनिया में कारतूस या तालिबानी आतंक या इसी जैसा एक दूसरा प्रश्न भी दुनिया के सामने खड़ा है, खड़ा था और आगे कब तक खड़ा रहेगा? बड़ा प्रश्न है। बताया जा रहा है कि आगामी अक्टूबर- नवम्बर से देश और दुनिया पुनः उसी मोड़ पर खड़ा होगा और उसे कोरोना की तीसरी लहर कहा जायेगा। कोरोना महामारी की पहली और दूसरी लहर का कहर झेल चुके देश या देशों के सामने तीसरी लहर की आशंका मुँह बाये खड़ी है। सवाल सबसे बड़ा है कि तीसरी लहर आ रही है तो कब तक आयेगी? आयेगी तो कितनी खतरनाक होगी? आयेगी भी या नहीं आयेगी? सूचना मिल रही है कि ब्रिटेन और यूरोप के कई स्थानों में कोरोना की तीसरी लहर आ चुकी है। इस बात से सभी परिचित हैं कि भारत बड़ी और सघन जनसंख्या वाला देश है; इसलिये यहाँ गतिविधियाँ और गमनागमन व्यापक पैमाने पर होता है। यह भी है कि भारत में सामान्य जनमानस बनावटी और दिखावटी सतर्कता का बहुत अभ्यासी नहीं है, जिसकी कोरोना से बचाव में अधिक आवश्यकता है। यहाँ के अधिकांश जनमानस की जीवन को लेकर सहजता को कई लोग देहातीपन कहकर मजाक उड़ा सकते हैं; लेकिन वे भारत की उस ताकतवर सांस्कृतिक विरासत के मूल्य को नहीं समझ सकते, जो मास्क एवं सेनेटाइजर पर नहीं; प्रकृति से उपजी आयुवेर्दिक औषधियों पर निर्भर करती है और जहाँ प्रकृति के निकट रहना स्वस्थ रहने के लिये आवश्यक माना जाता है। जहाँ स्वक्षता के नाम पर टाइल्स पत्थर आर सी सी और वातानुकूलन पर निर्भरता नहीं है। शुरुआत यदि कोरोना से काफी संवेदनशील देश की राजधानी दिल्ली से करें तो बीते जुलाई- अगस्त में कोविड- 19 से एक भी मौत नहीं हुई है। लेकिन यह भी बड़ा सत्य है कि बीते अप्रैल- जून तक राजधानी बहुत ही खराब स्थिति में थी।

 

कमोबेश फरवरी- मार्च जैसी स्थिति अभी फिर से बन गई है। दिल्ली समेत उत्तर भारत के ज्यादातर राज्यों में कोविड काबू में नजर आ रहा है। ठीक पिछले मार्च की तरह केरल और महाराष्ट्र में केस लगातार स्थिर या घट रहे हैं। पिछले मार्च की तरह लोग मास्क से दूरी बना रहे हैं और बीते मार्च की ही तरह मार्केट में भीड़ होने लगी है। कम होते सक्रिय मामलों के बीच तीसरी लहर की आहट सुनाई नहीं दे रही है; लेकिन कुछ राज्यों से आते मामलों की संख्या चिन्ताजनक है। देश के स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़े के अनुसार केरल अकेले भारत के कुल कोरोना मामलों का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सेदार है। अप्रैल में यह आंकड़ा लगभग 6 प्रतिशत ही था और जून में यह क्रमशः बढ़ते हुए 11 और 17 प्रतिशत हो गया। कुछ ऐसी ही हालत महाराष्ट्र की है, जहाँ देश के कुल मामलों का लगभग 21 प्रतिशत महाराष्ट्र में है। अप्रैल में यह केवल लगभग 27 प्रतिशत था। भारत की आबादी में लगभग 10 लाख बच्चे गम्भीर रूप से कुपोषित हैं; यदि कोरोना की तीसरी लहर आयी, तो ये बच्चे और इनके अविभावक कैसे इसका सामना करेंगे? यह भी एक बड़ा प्रश्न है। यदि विशेषज्ञ कहे जाने वाले लोगों की बात मान ली जाय तो अधिकांश विशेषज्ञों ने माना है कि भारत में तीसरी लहर अवश्य आयेगी और यह अक्टूबर- नवम्बर में आयेगी। वहीं कुछ विशेषज्ञों ने अगस्त- सितम्बर 2021 और कुछ ने नवम्बर 21- फरवरी 22 के बीच तीसरी लहर के आने की आशंका जताया है। भारत के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थान एम्स द्वारा सैम्पल साइज सर्वे के साथ सीरो प्रिवलेंस स्टडी की गयी; जिसमें 4500 लोगों का आंकड़ा लिया गया और उसके बाद कहा गया कि भारत में तीसरी लहर आयी तो उसमें बड़ों एवं बच्चों में रिस्क लगभग बराबर रहेगा। तात्पर्य यह कि ऐसा नहीं कह सकते कि बच्चों को वयस्कों की अपेक्षा खतरा अधिक होगा।

 

तीसरी लहर का दुनिया में जो आतंक है, वह मनुष्य की मनोदशा को व्यापक रूप में प्रकट और परिभाषित कर रहा है। ब्रिटेन में अभी कोरोना की तीसरी लहर आ चुकी है; जहाँ दूसरी लहर में प्रतिदिन 50 हजार से ज्यादा मामले मिल रहे थे, जबकि तीसरी लहर की शुरुआत में ही 35 हजार से अधिक मामले सामने आ रहे हैं। बांग्लादेश में पहले सात हजार मामले मिल रहे थे; लेकिन अब 13 हजार से अधिक मामले प्रतिदिन मिल रहे हैं। इसी तरह इण्डोनेशिया में 12 से बढ़कर 40 हजार से अधिक मामले रोजाना मिल रहे हैं। इससे पता चल रहा है कि कोरोना की अगली लहर काफी गम्भीर हो सकती है। भारत में यह आंकड़ा और भी बड़ा हो सकता है। ऑस्ट्रेलिया के भी कई शहरों में लॉक डाउन लगाया जा चुका है। सभी शोध, पूर्वानुमान और विशेषज्ञों की राय में एक बात कॉमन है कि तीसरी लहर आयेगी। यह भी कहा जा रहा है कि तीसरी लहर बाकी दो लहरों से अधिक खतरनाक होगी। यह डेल्टा प्लस वैरियेन्ट के कारण होगा; जिसका देश में पहला केस महाराष्ट्र में मिला था। भारत के स्वास्थ्य मन्त्रालय के एक अधिकारी के अनुसार- जब वायरस में म्यूटेशन होता है, तब उसकी जीवन शक्ति बढ़ जाती है। जब कई केस होते हैं तो उसके म्यूटेशन की आशंका भी अधिक होती है। ऐसे में सावधानी ही हथियार है; मास्क और दो गज दूरी के साथ वैक्सीनेशन भी जरुरी है। सरकार की एक रिपोर्ट में इसे लेकर चेतावनी दी गई है और बताया गया है कि अक्टूबर के आसपास किसी भी समय देश में कोरोना की तीसरी लहर दस्‍तक दे सकती है। एक महत्वपूर्ण पूर्वानुमान महामारी की गणितीय आगणन के आधार पर आया है, जिसमें कहा गया है कि कोरोना की तीसरी लहर नवम्बर में चरम पर होगी; लेकिन ऐसा तभी होगा जब कोरोना वायरस के डेल्टा वैरियेन्ट के अलावा उसके अन्य स्वरूप भी सामने आयेंगे। पूर्वानुमान के अनुसार- कोरोना की दूसरी लहर की तरह तीसरी लहर के मामलों में तेजी नहीं आयेगी और सम्भव है कि इससे काफी हद तक पहली लहर की जैसी ही स्थिति उत्पन्न हो। यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि यदि वायरस का नया वैरियेन्ट नहीं आता है तो हो सकता है कि तीसरी लहर आये भी नहीं।

 

ये सभी पूर्वानुमान यद्यपि ठोस अनुमानों पर आधारित हैं। वायरस के डेल्टा वैरियेन्ट की वजह से देश में दूसरी लहर आई थी। मार्च से मई के बीच इसने विकराल रूप धारण कर लिया था; जिसमें लाखों लोग संक्रमित और हजारों लोगों की मौत हुई थी। सात मई को देश में कोविड-19 के सबसे अधिक 414188 नये मामले आये थे। फिर भी इधर यह सुखद सूचना है कि भारत सरकार कोरोना की \’महावैक्सीन\’ बनाने की तैयारी में है और उसको इसमें सफलता के अच्छे आसार दिख रहे हैं; जिसमें टीका लगाने के बाद सबन्धित व्यक्ति सौ प्रतिशत निश्चिन्त हो सकेगा। किन्तु इसके पहले राष्ट्रीय आपदा प्रबन्धन संस्थान ने तीसरी लहर की चेतावनी भी दिया है। अपनी रिपोर्ट में उसने अक्टूबर के आसपास तक कभी भी कोरोना की तीसरी लहर आने की आशंका व्यक्त किया है। रिपोर्ट में बच्चों के लिये खास तैयारी करने पर जोर दिया गया है। दूसरी तरफ दहशत या आतंक की स्थिति क्या है? उस पर विचार करना बहुत आवश्यक है। वैश्विक गणित और आतंक का आलम वैचारिक अधिक है और इसी कारण चीन से अक्टूबर 2019 में शुरू हुए कोरोना की जैविक आतंक ने जैसे दुनिया को परेशान कर रखा है; वैसे ही जैसे मार्क्सवाद, साम्यवाद, माओवाद, आतंकवाद और नक्सलवाद के विविध रूपों ने दुनिया और मानवता को संकट में डाल रखा है। इनके भिन्न- भिन्न स्वरूपों को अपने निजी हित में जिस भी देश, समूह या समाज ने संरक्षण दिया है, आगे चलकर स्वयं वही इनका शिकार भी हुआ है। अमेरिका, रूस की जो भी वैश्विक नीति रही है; वह अपने निजी हित को अधिक ध्यान देने के कारण, वे मानवता के दुश्मनों के इन प्रकार के दहशतों को समूल नष्ट कर देने की दिशा में प्रवृत्त नहीं हो पाये हैं। क्योंकि यह तय है कि वैचारिक दृष्टि से दुनिया में पूँजीवाद से सैकड़ों गुना खतरनाक मार्क्सवाद साम्यवाद और माओवाद आदि हैं। वर्तमान परिस्थितियों में भारत की भूमिका निश्चित ही, अफगानिस्तान की घटना और हो सकने वाली पंचशीर की स्थिति, जो बाइडेन की राजनीति एवं चीन की अमानवीय वैचारिक महत्वाकांक्षा के बीच से कोई मानवीय मार्ग निकाल सकेगी, इसका पूरा भरोसा किया जाना चाहिये।

 

(यथावत, नयी दिल्ली के 01-15 सितम्बर 2021 के अंक में प्रकाशित।)

 

डॉ कौस्तुभ नारायण मिश्र