आज की प्रचलित अवधारणा के अनुसार जल संरक्षण, संसाधन संरक्षण का एक अंश है। आज जिसे संसाधन समझा जाता है, वे सभी- जल, मृदा (पृथ्वी), वन (गगन), ऊर्जा (पावक), खनिज (समीर) सृष्टि के नियामक एवं संचालक लौकिक सत्ता हैं। इसी कारण वैदिक संस्कृति में इन्हें देवता कहा गया और वैदिक ऋचाओं में इनके महत्व तथा महिमा का गान किया गया है। इसीलिये वैदिक संस्कृति, जो कि यज्ञ संस्कृति का हेतु है, के आरम्भ में संकल्प का विधान है और यज्ञ के समय भी उनकी आराधना के महत्व को समझाया गया तथा इस समय इनका उपयोग किया जाता है। सृष्टि के मूर्त निर्माण में भी इन्हीं की भूमिका है। आज जिन्हें आप संसाधन कहते हैं- मृदा, जल, वनस्पति, ऊर्जा, खनिज, मानव; यदि वैदिक वाङ्गमय एवं सांस्कृतिक स्वरूप की गहरायी में जायेंगे तो पायेंगे कि, ये सभी देवता हैं, यही संकल्प करने, यज्ञ- हवन करने और आराधना के आधार हैं। इन सबके अधिष्ठाता देवता सूर्य हैं और इसीलिये वेदों के भी अधिष्ठाता देव सूर्य हैं तथा इसी कारण इनकी अधिष्ठात्री देवी माता गायत्री हैं और वेदों की भी अधिष्ठात्री देवी माता गायत्री हैं। इसी कारण गायत्री मन्त्र के माध्यम से सूर्य देव की आराधना की जाती है। इस प्रकार सूर्य देव, विभिन्न ग्रह- उपग्रह, विभिन्न प्रकार के संसाधन के मूल्य एवं महत्व को किसी न किसी रूप में वेदों के सूक्तों में गाया गया है। आज जिसे मानव- संसाधन कहा जा रहा है; उसके लिये बताया गया है कि, क्षिति जल पावक गगन समीरा। पञ्च तत्व यह रचित शरीरा। ये सभी पञ्च तत्व जब व्यक्ति के ठीक- ठीक समझ में आयेंगे; तभी उसको संसाधन समझ में आयेंगे और तभी वह वेदों की श्रेष्ठता को समझ पायेगा। जब कोई इतना समझ एवं स्वीकार कर लेगा अर्थात जो वेद समझेगा एवं स्वीकारेगा, जो वैदिक संस्कृति को समझेगा एवं स्वीकारेगा; वही सृष्टि के निर्माण के रहस्य रोमांच एवं उसकी संरचना को समझेगा एवं स्वीकारेगा। इतना समझने और स्वीकारने वाला ही जल जैसे संसाधनों को समझेगा और स्वीकारेगा और फिर वही संसाधन के संरक्षण को एवं उसके मूल्य को समझे और स्वीकारेगा। फिर उसके लिये जल तथा शेष संसाधनों एवं उसके संरक्षण को समझने और स्वीकारने का मार्ग प्रशस्त होगा।
यह सही है कि पृथ्वी ही नहीं सम्पूर्ण सृष्टि की संरचना का लगभग सत्तर प्रतिशत जल एवं शेष लगभग तीस प्रतिशत ठोस है तथा गैसीय अवस्था अलग है। ठीक इतना ही सत्य यह भी है कि, सभी पाँचों संसाधन मृदा, जल, वन, ऊर्जा, खनिज इन सबकी भिन्न- भिन्न रूपों में तीनों अवस्थाएँ- ठोस, द्रव, गैस पायी जातीं हैं और आपस में अपना रूप बदलती रहती हैं। जल नामक संसाधन इसी कारण जल- चक्र का निर्माण करता है और इसी कारण उसकी गत्यात्मकता या गतिशीलता बनी रहती है। जैसे किसी भी जलराशि से जल वाष्पीकृत होकर वायुमण्डल में जाता है, फिर सामान्य ताप ह्रास दर के कारण वर्षण के विभिन्न रूपों में जमीन पर आता है; पुनः अलग- अलग माध्यमों से समुद्र आदि जलराशियों में मिल जाता है। यह क्रम अनवरत चलता रहता है। यह क्रम निर्वाध एवं बिना दूषित होते हुये चलते रहना चाहिये; यदि ऐसा होता रहना अनवरत जारी है, तो जल संरक्षित है और यदि इस क्रम में बाधा या दूषित होने की स्थिति उत्पन्न होती है तो, इसका आशय है कि जल असंरक्षित है तथा उसके संरक्षण के लिये उपाय करने की अनिवार्य आवश्यकता है। क्योंकि प्रकृति या सृष्टि की व्यवस्था में अव्यवस्था उत्पन्न नहीं करना चाहिये। इस कारण आज जबकि मनुष्य का अपने क्रिया- कलाप पर नियन्त्रण नहीँ रह गया है अर्थात वह प्रकृति के जल-चक्र, ऊर्जा चक्र आदि जैसी व्यवस्था का अनुशरण नहीं कर रहा है तो दुनिया एवं सम्पूर्ण मानवता के लिये जल- संरक्षण एक अनिवार्य आवश्यकता बन गयी है और बनती जा रही है। संसार के प्रत्येक प्राणी का जीवन आधार जल ही है। शायद ही ऐसा कोई प्राणी हो जिसे जल की आवश्यकता न हो। जल हमें समुद्र, नदियों, तालाबों, झीलों, वर्षा एवं भूजल के माध्यम से प्राप्त होता है। गर्म हवाओं के चलने से समुद्र, नदियों, झीलों, तालाबों का जल वाष्पित होकर ठंडे स्थानों की ओर चलता है; जहाँ पर न्यून तापमान के कारण संघनित होकर वर्षा के रूप में पृथ्वी पर गिरता है। जबकि पहाड़ों पर और भी कम तापमान होने के कारण जल बर्फ के रूप में जम जाता है जो कि गर्मी के दिनों में पिघलकर नदियों में जाता है। जल के महत्व एवं मूल्य को ध्यान में रहकर सामान्य नागरिकों एवं स्वयंसेवी संगठनों को इसके संरक्षण के लिये जागरूक होकर कार्य करना चाहिये; ऐसे कार्य न केवल सरकार कर सकती है और न केवल संविधान कर सकता है।
मानव अपने स्वास्थ्य, सुविधा, दिखावा व विलासिता को दिखाने के लिये जल जैसे अमूल्य संसाधनों की बर्बादी करता है। पानी का उपयोग करते हुए हम पानी की बचत के बारे में जरा भी नहीं सोचते हैं। परिणामस्वरूप अधिकांश जगहों पर जल संकट की स्थिति पैदा हो चुकी है। यदि हम अपनी आदतों में थोड़ा भी बदलाव कर लें तो पानी की बर्बादी को रोका जा सकता है। सामान्य सर्वेक्षण इस बात को स्पष्ट रूप से इंगित करते हैं कि मानव यदि अपनी आदतों को बदल ले तो कुल व्यय हो रहे जल में से 60 प्रतिशत से भी अधिक पानी की बचत हो सकती है। यदि मानव अपनी कुछ आदतों में सुधार कर ले तो भी 20 प्रतिशत जल की बचत आसानी से सम्भव है। एक- एक बूँद पानी की बचत ही जल संरक्षण का आधार बनेगी। जैसा कि बताया गया है कि जल संरक्षण का अर्थ पानी बर्बादी तथा प्रदूषण को रोकने से है। यह एक अनिवार्य आवश्यकता है क्योंकि वर्षा जल हर समय उपलब्ध नहीं रहता। विदित है कि विश्व में 350 मिलियन क्यूबिक मील पानी है। इसमें से 97 प्रतिशत भाग समुद्र से घिरा हुआ है। पृथ्वी पर जल तीन स्वरूपों में उपलब्ध होता है- एक- तरल जल, समुद्र नदियाँ, झरने, तालाब, कुएँ आदि; दो- ठोस जल (बर्फ), पहाड़ों तथा ध्रुवों पर जमी बर्फ एवं तीन- वाष्प (भाप), बादलों में भाप या वाष्प। यदि हमारे देश में वर्षाजल के रूप में प्राप्त पानी का पर्याप्त संग्रहण व संरक्षण किया जाय, तो यहाँ जल संकट को काफी हद तक घटाया जा सकता है। हमारे देश की अधिकांश नदियों जैसे- कावेरी, कृष्णा, माही, पेन्नार, साबरमती, गोदावरी और ताप्ती आदि में जल की न्यूनता हो जाती है। जबकि कोसी, नर्मदा, ब्रह्मपुत्र, सुवर्ण रेखा, वैतरणी, मेघना और महानदी आदि में प्रायः जलातिरेक की स्थिति है। ऐसे में सतही पानी का जहाँ अधिक भाग हो, उसे वहीं संरक्षित करना चाहिये; क्योंकि भारत में वर्ष 2050 तक अधिकांश नदियों में जलाभाव की स्थिति उत्पन्न होने की सम्भावना है। भारत के 4500 बड़े बाँधों में 220 अरब घनमीटर जल के संरक्षण की क्षमता है। देश के 11 मिलियन ऐसे कुएँ हैं, जिनकी संरचना पानी के पुनर्भरण के अनुकूल है। यदि मानसून अच्छा रहता है अर्थात वर्षात अच्छी होती है तो इनमें लगभग 30 मिलियन पानी का पुनर्भरण हो सकता है।
वैसे तो सभी प्रकार के संसाधनों के संरक्षण की आवश्यकता है; क्योंकि शुद्ध एवं पर्याप्त संसाधन उपलब्धता ही किसी समाज या देश या स्वयं प्रकृति की जीवन्तता, सजीवता, विराटता, विकास, उज्जवल भविष्य का आधार है। इनमें भी जल जैसे संसाधन के संरक्षण की आवश्यकता तो अनेक कारणों से और भी महत्वपूर्ण है, जैसे- जल का समुचित वितरण एवं उपयोग सुनिश्चित करना; शुद्ध जल की निरन्तर हो रही कमी को पूरा करना; संकट या सूखा या गर्मी के समय में जल संकट की स्थिति न आने देना; भावी पीढ़ियों के लिये जल की उपलब्धता सुनिश्चित करना। यद्यपि पानी की एक बूँद, मात्रा में बहुत कम लगती है; किन्तु इसे न रोका जाय तो बहुत पानी बरबाद हो जाता है। उदाहरण के लिये- एक टपकते नल से प्रति सेकण्ड एक बूँद बर्बाद होते रहने से एक माह में 760 लीटर पानी व्यर्थ हो जाता है; सीधे नल से नहाने पर प्रति व्यक्ति लगभग 60-70 लीटर पानी खर्च होता है; हाथ धोकर नल ठीक प्रकार से न बन्द करने पर एक मिनट में 30 बूँद पानी तथा वर्ष में लगभग दस हजार लीटर पानी व्यर्थ चला जाता है; पाइप से बगीचे की सिंचाई पर पानी की भारी बर्बादी होती है; प्रेशर से कार धोने, जल की धार से सब्जियाँ धोने में पानी बर्बाद होता है; खेतों में नहर या पाइप से सिंचाई करने में अधिक पानी लगता है; टाॅयलेट और यूरिनल में लोग काफी पानी बर्बाद करते हैं; सार्वजनिक नलों से बहता हुआ पानी अधिक मात्रा में बर्बाद होता है। इसी प्रकार यदि सावधानी बरती जाय तो, ड्रिप सिंचाई प्रणाली से कम पानी में अधिक सिंचाई हो जाती है, इससे लगभग आधा पानी बच जाता है; छोटे गिलासों में पानी पीने से पानी की बचत होती है; कम रिसाव वाले मटकों का उपयोग करने से जल की बचत होती है; लाॅन, पौधों आदि में शाम को ही पानी दें, उस समय पानी भी कम लगता है और पोषण भी ठीक मिलता है; अधिक संख्या में कपड़े होने पर ही वाशिंग मशीन का उपयोग करें; फल और सब्जियाँ किसी टब या बर्तन में धोएँ; फ्लश टैंक में पानी का व्यर्थ उपयोग न करें; वाहनों को बाल्टी में पानी लेकर धोएँ; शाॅवर के बजाये बाल्टी व मग से नहाएँ; बर्फ के टुकड़ों को किसी पौधे या लाॅन में डालें; दाढी बनाते समय, ब्रश करते समय तथा मुँह आदि धोते समय लगातार नल न चलाएँ; मेहमानों को आधा गिलास पानी दें, बाद में माँगने पर ही और दें। इस प्रकार या इन जैसे अन्य छोटे-छोटे उपायों से जल की बचत हो सकती है। बस आवश्यकता है इन पर अमल करने की और इसके लिये लोगों को जागरूक करने की। हमेशा समय से किया गया छोटा प्रयास, बड़े परिणाम देता है।
जल संग्रहण के लिये हर स्तर पर प्रयास की आवश्यकता है। यदि निम्नलिखित बातों पर ध्यान दिया जाय तो जल संरक्षण सुगम हो जाता है। उदाहरण के लिये- प्रत्येक गाँव/बस्ती में एक तालाब होना आवश्यक है, जिसमें जल संग्रह हो सके तथा आवश्यकतानुसार उपयोग में लाया जा सके; नदियों पर छोटे-छोटे बाँध व जलाशय बनाये जायँ, ताकि बाँध में पानी एकत्र हो सके तथा आवश्यकतानुसार उपयोग में लाया जा सके; नदियों में प्रदूषित जल को डालने से पूर्व उसे साफ करना जरूरी है ताकि नदियों का जल साफ सुथरा बना रहे; अधिक से अधिक वृक्षारोपण किया जाय, जिससे ये वृक्ष एक तरफ तो पर्यावरण को नमी पहुँचाएँ तथा दूसरी ओर वर्षा करने में सहायता करें; जल प्रवाह की समुचित व्यवस्था होनी आवश्यक है, कस्बों, नगरों से गन्दे पानी का निकास आवश्यक है; जल को व्यर्थ में बर्बाद न करें और न ही प्रदूषित करें; भूमिगत जल का उपयोग समय तथा उपलब्धता के आधार पर ही किया जाना चाहिये, जिससे अत्यधिक आवश्यकता के समय इसका उपयोग किया जा सके; भवनों, सार्वजनिक स्थलों, सरकारी भवनों में जल संरक्षण के लिये व्यवस्था की जाय; जल को गहरे जमीन में छोड़ दें, जिससे वह अन्दर जाकर भूजल स्तर को ऊपर उठाने में मदद करें; जल का उचित संवहन तथा स्थानान्तरण भी जल संरक्षण के लिये महत्त्वपूर्ण है। राष्ट्रीय विकास में जल की महत्ता को देखते हुए ‘जल संरक्षण’ को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता मानते हुए हमें निम्नलिखित आसान उपायों को करने के लिये जनजागरण अभियान चलाकर जल संरक्षण सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिये, जैसे- बच्चों, महिलाओं, पुरूषों को जल संरक्षण के महत्व व आवश्यकता से अवगत कराना चाहिए; बाल्टी से स्नान/शौच आदि की आदत डालनी चाहिए; गाँवों में तालाबों को गहरा करके वर्षा जल संचित करना चाहिये; नगरों/महानगरों में घरों की नालियों का पानी गड्ढे में एकत्र करके इसे सिंचाई के काम में लेना चाहिये; घर की छत पर वर्षाजल का भण्डारण करके इसे काम में लिया जाय; घरों, सार्वजनिक स्थानों पर नल की टोंटियों की सुरक्षा की जाय; समुद्री खारे जल को पेयजल व घरेलू उपयोग योग्य बनाने के लिये समुचित प्रौद्योगिकी का उपयोग किया जाय; गंगा-यमुना जैसी सदानीरा नदियों की नियमित सफाई सुनिश्चित की जाय तथा इन्हें प्रदूषण मुक्त बनाया जाय; वृक्षारोपण को हर स्तर पर प्रोत्साहित किया जाय; विद्यालय की पाठ्यपुस्तकों में ‘जल संरक्षण’ एक विषय के रूप में पढ़ाया जाय, जिससे बचपन से ही बच्चों में यह संस्कार स्वतः विकसित हो सके। इसे हर स्तर पर एक अनिवार्य विषय बना दिया जाय आदि। जल संरक्षण की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण पहल अवश्य की जा सकती है। यदि समाज का हर एक व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी निभाने लगे तो जल संरक्षण सहज एवं सरल कार्य है।
जल संकट किसी देश मात्र की नहीं, बल्कि समूचे विश्व की समस्या है। जिसे हम विकास कहते हैं, यदि वह टिकाऊ विकास (सस्टनेबल डेवलपमेन्ट) नहीं है तो वह विनाश का आधार होता है। टिकाऊ विकास हमेशा- समन्वित विकास (इंटीग्रेटेड डेवलपमेन्ट), संश्लिष्ट विकास (कम्पोजिट डेवलपमेन्ट), संधृत विकास (इको डेवलपमेन्ट) का समुच्चय होता है। भूजल पानी का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत है और पृथ्वी पर होने वाली जलापूर्ति अधिकतर भूजल पर ही निर्भर करती है, लेकिन आज इसका इतनी बेदर्दी से दोहन हुआ है कि परिणामस्वरूप अनियमित वातावरण की स्थिति पैदा हो चुकी है। कहीं पर धरती फट रही है तो कहीं पर अचानक जमीन तप रही है; क्योंकि जब-जब पानी का अत्यधिक दोहन होता है तब-तब जमीन के अन्दर के पानी का उत्पलावन बल कम होने या समाप्त होने पर जमीन धँस जाती है तथा उसमें दरारें पड़ जाती हैं। यह तभी रोका जा सकता है जबकि भूजल के उत्पलावन बल को बरकरार रखा जाय अर्थात पानी समुचित मात्रा में रिचार्ज होता रहे। इसका एकमात्र उपाय यही है कि ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में भूजल के दोहन को नियन्त्रित किया जाय और वर्षा जल को संरक्षित कर भूजल में जाकर मिलने को प्राकृतिक रूप से प्रेरित किया जाय। योजना आयोग के अनुसार भूजल का 80 प्रतिशत से अधिक भाग कृषि क्षेत्र में उपयोग होता है। जबकि 5 प्रतिशत सतही जल घरेलू उपयोग में लाया जाता है। इसको कम करके वर्षा या अन्य प्रकार के जल का उपयोग करना तथा भूजल को पुनर्भरण (रीचार्ज) करना चाहिये। आजादी के समय देश में प्रतिवर्ष प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 5000 क्यूबिक मीटर थी जबकि उस समय देश की आबादी 40 करोड़ थी। अनुमान है कि वर्ष 2025-30 में यह घटकर 1500 क्यूबिक मीटर रह जायेगी और तब तक देश की आबादी लगभग 1.4 अरब हो जायेगी। योजना आयोग के अनुसार देश का लगभग एक चौथाई क्षेत्र पानी की भीषण समस्या से जूझ रहा है। इसके लिये कृषि के साथ-साथ उद्योग भी जिम्मेदार हैं। औद्योगिक इकाइयाँ इतना पानी एक दिन में ही खींच लेती हैं जितना पानी एक गाँव पूरे महीने भी नहीं खींच पाता है। प्रश्न यह है कि जिस देश में पानी की उपलब्धता 2300 अरब घनमीटर है तथा जहाँ पर सदानीरा नदियों का जाल बिछा हुआ है, वहाँ पर पानी का इतना भीषण संकट क्यों? इसका एक मात्र कारण यह है कि वर्षा से मिलने वाले कुल पानी का लगभग पचास प्रतिशत नदियों के माध्यम से समुद्र के खारे पानी में मिल जाता है। इसको बचाया और संरक्षित किया जा सकता है। इसके लिये वर्षा जल का संग्रहण, संरक्षण तथा समुचित प्रबन्धन आवश्यक है। यही एकमात्र विकल्प भी है। यह तभी सम्भव है, जब पूरा समाज जोहड़ों, तालाबों आदि को पुनर्जीवित करे, खेतों में सिंचाई के लिये पक्की नालियों का निर्माण हो। बहाव क्षेत्र में पानी को संचित किया जा सकता है; इसके लिये बाँध बनाये जा सकते हैं, जिससे यह पानी समुद्र में न जा सके। इसके साथ ही साथ बोरिंग, ट्यूबवेल पर नियन्त्रण लगाया जाय। जरूरी यह भी है कि पानी की उपलब्धता के गणित को समाज भी समझे। यह आम-जन की जागरूकता तथा सहभागिता से ही सम्भव है। भूजल संरक्षण के लिये देशव्यापी अभियान चलाया जाना अति आवश्यक है, ताकि भूजल का समुचित नियमन हो सके। अकेली सरकार इसमें कुछ नहीं कर सकती है। यह काम आम आदमी के सहयोग से सम्भव है। वैदिक या भारतीय संस्कृति में जल को जीवन का आधार माना जाता है। इसी कारण जल को संचित करने की परम्परा भारत में शुरू से ही रही है। अतः समाज ही इस अभियान में सहयोग दे सकता है। जो भी व्यक्ति संस्था और संगठन इस दृष्टि से आगे आकर कार्य कर रहे हैं, उनकी जितनी सराहना की जाय, कम है। केवल सरकारी सहायता पर निर्भर नहीं होना चाहिये और यह सम्भव भी नहीं है। क्योंकि सरकारें अपने पाले में गेंद न डालकर अपना कर्तव्य निभा लेती हैं। वर्तमान जल संकट को देखते हुए देश-विदेश में हर मञ्च पर जल संरक्षण की विगत दो दशक से चर्चा हो रही है; लेकिन क्रियान्वयन कमजोर है। विभिन्न सरकारों द्वारा इसके लिये योजनाबद्ध ढंग से काम भी किये जा रहे हैं। किन्तु इस कार्य को एक सामाजिक अभियान बनाने का समय आ चुका है।
इस दृष्टि से दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन भी \’राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ\’ तथा दुनिया का सबसे बड़ा शिक्षण- प्रशिक्षण समूह \’विद्या भारती\’ जैसे संगठन एवं संस्थाएँ योजनाबद्ध तरीके से अनवरत कार्य एवं व्यवहार कर रही हैं। संघ की तरफ से तो इसके लिये ब्लॉक से लेकर राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ग्राम्य- विकास, पर्यावरण संरक्षण, जल- संरक्षण जैसे अभियान चलाये जा रहे हैं। इसी प्रकार विद्या भारती द्वारा देश भर में अपने लाखों शिक्षकों, विद्यार्थिंयों, अविभावकों आदि के माध्यम से इनके लिये धरातलीय स्तर पर कार्य किये जा रहे हैं। देश भर में फैले उनके हजारों विद्यालयों एवं छात्रावासों में इसके लिये योजनाबद्ध कार्य एवं उसका व्यवहार वर्षों से किया जा रहा है। यह कार्य वास्तव में समाज एवं देश को सुदृढ करने की दशा में अतुलनीय प्रयास है। इसी प्रकार अन्य लोगों, संस्थाओं एवं संगठनों को भी आगे आकर यथार्थ धरातल पर कार्य करना चाहिये। संघ एवं विद्या भारती की पहुँच समाज के सभी वर्ग, उनके परिवार एवं घरों तक है; वे इसमें अपना अमूल्य योगदान बिना सरकार के सहयोग की प्रतीक्षा किये कर रहे हैं। ये लोग वायो- शौचालयों, जल-रहित शौचालय; कारों को बिना जल के साफ़ करना;
इन्फ्रारेड अथवा पैर से चलने वाले नल; पुनर्चक्रण (रीसाइकिलिंग) आदि जैसे कार्य व्यावहारिक रूप से एवं आधुनिक तकनीकों का प्रयोग करके अनवरत कर रहे हैं। इनके द्वारा पारम्परिक, व्यावहारिक एवं नवीनतम तकनीकों की सहायता से समूचे पर्यावरण संरक्षण, संसाधन संरक्षण एवं जल संरक्षण हेतु विशेष कार्य योजना बनाकर कार्य किये जा रहे हैं। देश में सरकारी अनुदान पर तथा बिना अनुदान के कार्य कर रही संस्थाओं एवं संगठनों को भी देश तथा समाज हित में इनसे प्रेरणा लेकर इस दिशा में कार्य करना चाहिये। रसोई और स्नानघर में प्रयोग किये जाने वाले जल को लेकर संघ एवं विद्या भारती के जल संरक्षण के उपाय सराहनीय हैं। कृषि कार्य में प्रयोग होने वाले जल के नियमन एवं संरक्षण हेतु इनके जागरूकता अभियान की वर्तमान एवं भावी योजनाएँ भी प्रेरणास्पद हैं। प्राचीनतम एवं सबसे आम तरीक़ा बाढ़ सिंचाई में पानी का वितरण अक्सर असमान होता है, जिसमें भूमि का कोई अंश अतिरिक्त पानी ले सकता है; जिससे वह दूसरे हिस्सों में पर्याप्त मात्र में पानी नमी पहुँचा सके। ऊपरी सिंचाई, केन्द्र-धुरी अथवा पार्श्व-गतिमान छींटों का उपयोग करते हुए कहीं अधिक समान एवं नियन्त्रित वितरण पद्धति; ड्रिप सिंचाई सबसे महंगा एवं सबसे कम प्रयोग होने वाला प्रकार है, लेकिन पानी बर्बाद किये बिना पौधों की जड़ तक पानी पहुंचाने में यह सर्वश्रेष्ठ परिणाम देता है। चूँकि सिंचाई प्रणाली में बदलाव लाना एक व्ययसाध्य कदम है, अतः वर्त्तमान व्यवस्था में जल संरक्षण के प्रयास अक्सर दक्षता बढ़ाने की दिशा में केन्द्रित होने चाहिये। इसके अन्तर्गत जमा मिटटी, पानी को बहने से रोकने के लिये कुण्ड बनाना एवं मिटटी तथा वर्षा की आर्द्रता, सिंचाई कार्यक्रम की बढ़ोत्तरी में मदद शामिल है। रिचार्ज गड्ढे, जो वर्षा का पानी एवं बहा हुआ पानी इकट्ठा करते हैं तथा उसे भूजल आपूर्ति के रिचार्ज में उपयोग में लाते हैं। जल-क्षमता जल-संरक्षण का एक उपकरण है। इसका परिणाम जल का बेहतर प्रयोग होता है एवं इससे जल की मांग भी कम होती है। जल-क्षमता से आशय, जल से सम्बन्धित उपाय के मूल्य एवं लागत का मूल्यांकन अन्यान्य प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ने वाले इसके प्रभाव को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिये। जल क्षमता को- किसी क्रिया, कार्य, प्रक्रिया के निष्पादन या संभाव्य जल के न्यूनतम मात्रा के परिणाम या किसी निश्चित उद्देश्य के लिये अपेक्षित जल की मात्रा एवं उसमें प्रयुक्त होने वाले या वितरित जल की मात्रा के बीच के सम्बन्ध से है। जल- छमता, लागत प्रभावी न्यूनतम जल-नेटवर्क, जल-संरक्षण के लिये एक समग्र संरचना या दिशा निर्देशक है जो किसी औद्योगिक या शहरी व्यवस्था के लिए जल-प्रबन्धन पदानुक्रम के आधार पर स्वच्छ जल तथा अपशिष्ट जल की न्यूनतम मात्रा निर्धारित करता है, अर्थात यह जल बचाने के सभी उपयोगी उपायों पर विचार करता है। अधिकतम जल वसूली नामक तकनीकि केवल स्वच्छ जल की मात्रा बढ़ाने एवं पुनःप्रयोग तथा पुनःसृजन के माध्यम से अपशिष्ट जल में कमी लाने पर ही केन्द्रित है। इन अब दृष्टियों से संघ एवं विद्या भारती के अभियान सभी के लिये मार्गदर्शक संकेत हो सकते हैं।
किसी से भी प्रेरणा लेना और सकारात्मक दिशा में कार्य करना, बिना किसी पूर्वाग्रह के समाज के सभी लोगों को, सभी सरकारी, गैरसरकारी संस्थाओं तथा सरकारी एवं गैरसरकारी संगठनों को करना चाहिये। वर्षों से बढती जनसंख्या, औद्योगीकरण में वृद्धि तथा कृषि में विस्तार होने से जल की माँग बढती जा रही है। आपूर्ति भी पर्याप्त है; लेकिन आपूर्ति के स्रोत की मात्रात्मक एवं गुणात्मक पर्याप्तता कितनी है, यह वास्तविक विचारणीय प्रश्न है और इसी कारण जल- संरक्षण आज की अनिवार्य आवश्यकता बन गयी है। इस दिशा में जो भी कार्य कर रहा हो, उसको सम्मानित करने, पुरस्कृत करने का भी कार्य आवश्यक है; जिससे लोग प्रेरित हों। सबके लिये यह जरूरी प्रश्न है कि जल संरक्षण के लिये आप क्या कर सकते है? यदि स्वयं से इसके लिये योजना न बना सकें या उसका क्रियान्वयन न कर सकें तो दूसरे की योजना एवं क्रियान्वयन पद्धति का अनुशरण करें। कुछ दिन पहले ज्ञात हुआ है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एवं उसी क्रम में विद्या भारती जैसी शिक्षण की विस्तृत श्रृंखला समूह ने अपने राष्ट्रीय समितियों में वरिष्ठ पदाधिकारियों के साथ बैठक करके जल- संरक्षण जैसे कार्य को शीर्ष प्राथमिकता पर लिया है और इसके लिये अपने सभी कार्यकर्ताओं, अपने सभी निकायों, अपने सभी शिक्षकों, प्रबन्धतन्त्रों, छात्रावासों, अभिभावकों, छात्रों और उनके घरों में पहुँच बनाकर न केवल जागरूकता अभियान शुरू किया है; बल्कि जल- संरक्षण जैसी गतिविधि का कैसे व्यवस्थित क्रियान्वयन हो, इस दिशा में सघन कार्य शुरू किया है। कृषि कार्य में जल- संरक्षण की दृष्टि से ध्यान देना भी बहुत आवश्यक है। यदि भूमि 30 सेमी की गहराई तक जोता जाता है, तो 90 सेमी की गहरायी तक नमी हासिल की जा सकती है। अन्य प्रथायें जैसे बीजों की जल्दी बुवाई, उर्वरकों का कम उपयोग, खर पतवार- निराई, कीट और रोग नियंत्रण और समय पर कटाई मिट्टी में सीमित नमी के बावजूद उपज में वृद्धि करता है। मिट्टी में जैविक अवशेषों को मिलाने से मिट्टी की नमी का संरक्षण होगा। पहाड़ी ढलानों की खेती पानी की बहाव को रोकता है। छः प्रतिशत तक ढालू भूमि पर जहॉं भूमि की जल-शोषण क्षमता अधिक हो तथा 600 मिमी प्रतिवर्ष से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में समोच्च-बाँध बनाकर खेती की जानी चाहिये; जिससे एक समान ढाल की लम्बाई कम हो तथा दो बन्धों के बीच की भूमि पर खेती की जा सके। चोज या पहाड़ एवं मैदान के मिलन रेखा पर जल की प्रचुरता के संरक्षण का भी बड़ा कार्य है। इस प्रकार भूमि एवं नमी संरक्षण साथ-साथ हो जाते हैं। इस प्रकार के जल- संरक्षण के पुराने तथा नवीन क्षेत्रों में संघ एवं विद्या भारती के प्रयोग एवं उनका धरातलीय क्रियान्वयन निश्चित ही जल- संकट से मानवता को उबार पायेगा। इस दिशा में यदि अन्य द्वारा भी इसी प्रकार के समेकित प्रयास किये जायँ तो यह कार्य और आसान हो जायेगा।
(विद्या भारती की पत्रिका \’सृष्टि सम्वाद भारती\’ के अप्रैल 2021 के अंक में प्रकाशित।)
डॉ कौस्तुभ नारायण मिश्र
