शासन एवं सुशासन

सरकार में जवाबदेही एवं पारदर्शिता को भारतीय लोगों के बीच बढ़ावा देकर पूर्व प्रधानमन्त्री वाजपेयी जी को सम्मानित करने के लिये 2014 में सुशासन दिवस की स्थापना की गयी थी। इसी कारण सुशासन दिवस भारत में प्रतिवर्ष पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की जयन्ती के रूप में प्रतिवर्ष 25 दिसम्बर के दिन मनाया जाता है। सरकार ने सुशासन दिवस को सरकार के लिये कार्य दिवस के रूप में घोषित किया है। इसे ही अंगेजी में \’गुड गवर्नेन्स डे\’ भी कहते हैं। भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा 23 दिसम्बर 2014 को, नब्बे वर्षीय पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी और पण्डित मदन मोहन मालवीय (मरणोपरान्त) को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न के लिये नाम घोषित किया गया था। घोषणा के बाद, उस समय के निर्वाचित प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी जी के प्रशासन ने इसकी स्थापना करते हुए कहा कि- पूर्व प्रधानमन्त्री की जयन्ती को भारत में प्रतिवर्ष सुशासन दिवस के रूप में मनाया जाएगा। लेकिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि- उसी तिथि पर सुशासन दिवस की स्थापना के साथ- साथ उसी दिन क्रिसमस को भी सरकारी कार्य दिवस घोषित किया जाय, अन्यथा राष्ट्र में धर्मनिरपेक्षता पर सवाल खड़ा होगा? कांग्रेस को यह नहीं पता कि भारत में धर्मनिरपेक्षता, असंवैधानिक विषय है।

सुशासन से तात्पर्य किसी सामाजिक- राजनीतिक- प्रशासनिक ईकाई को इस प्रकार चलाना कि वह वांछित एवं लक्ष्योन्मुखी परिणाम दे; अन्त्योदय की भावना के अनुरूप हो; योजनानाओं, कार्यक्रमों, नीतियों का पारदर्शिता के साथ पूर्ण परिणाम सामने आये। इसके अन्तर्गत- अच्छा बजट, सही प्रबन्धन, कानून का शासन, सदाचार, ईमानदारी, कर्मठता इत्यादि सभी चीजें शामिल हैं। ठीक इसके विपरीत पारदर्शिता की कमी या सम्पूर्ण अभाव, जंगल राज, लोगों की कम भागीदारी, भ्रष्टाचार का बोलबाला आदि दुःशासन के लक्षण हैं। व्याकरण की दृष्टि से \’शासन\’ शब्द में \’सु\’ उपसर्ग लग जाने से \’सुशासन\’ शब्द का जन्म होता है। ’सु’ उपसर्ग का अर्थ शुभ, अच्छा, मंगलकारी आदि भावों को व्यक्त करने वाला होता है। राजनीतिक और सामाजिक जीवन की भाषा में सुशासन की तरह लगने वाले कुछ और बहुप्रचलित शब्द हैं जरूर, लेकिन वे हूबहू \’सुशासन\’ को प्रतिध्वनित नहीं करते हैं; जैसे – प्रशासन, स्वशासन, अनुशासन आदि। ’शासन’ आदिम अवस्था से लेकर आज तक की आधुनिक मानव सभ्यता के विकासक्रम में अलग-अलग विशिष्ट रूपों में प्रणाली के तौर पर विकसित और स्थापित होती आयी है। अलग- अलग कालखण्डों में इसकी विशेषताएँ अलग- अलग जरूर रहीं हैं और लोगों ने इसका उपयोग एवं दुरुपयोग भी किया है; लेकिन भारत में शासन एवं सुशासन के तत्व तथा विशेषताएँ परिवर्तनीय रहीं हैं, यह चिरन्तन पुरातन एवं सनातन रहा है। यदि किञ्चित किसी ने इसका दुरुपयोग किया है तो यह उसका दोष है, इसकी विशेषताओं का दोष नहीं रहा है। इस विकासक्रम में दिनचर्या, जीवनचर्या, जीवनमूल्य, परम्परा, संस्कार, सभ्यता, संस्कृति, धर्म से अर्जित ज्ञान और लोककल्याण की भावनाओं की अवधारणा प्रबल प्रेरक की भूमिका में रही है। इस अर्थ में शासन की सभी प्रणालियाँ सहज स्वाभाविक रूप से विकसित हुई हैं; यदि किसी ने उसमें कृत्रिमता लाने का प्रयास किया है तो, उसे से इसके दुरुपयोग की सम्भावना बढ़ी और नकारात्मकता आयी हुई दिखती है।

इस प्रकार कहना चाहिये कि सुशासन व्यक्ति को भ्रस्टाचार एवं लालफीताशाही से मुक्त कर प्रशासन को साधारण, नैतिक, उत्तरदायी, जिम्मेदार तथा पारदर्शी बनाता है। पारिभाषिक रूप से सुशासन के कुछ प्रमुख तत्व बताये जाते हैं जैसे- विधि का शासन, समानता एवं समावेशन, भागीदारी, अनुक्रियता, बहुमत/मतैक्य, प्रभावशीलता, दक्षता, पारदर्शिता, उत्तरदायित्व तथा निष्पक्ष आकलन; लेकिन भारत में यह इससे भी अधिक भाव विचार तथा कार्य प्रवणता रखता है। जिसके कारण मानवीय मूल्यों की स्थापना में योगदान होता है। भारत में प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी जी की मंशा के अनूरूप जब 25 दिसम्बर 2014 को सुशासन दिवस के रूप में मनाने का संकल्प लिया गया तो उसका मूल उद्देश्य था कि, देश में भयमुक्त (कोई भी व्यक्ति भय से रहित और सुरक्षित रहे), भूखमुक्त (प्रत्येक व्यक्ति मुख से रहित रहे और उसे भरपेट भोजन मिले), भ्रष्टाचारमुक्त (सरकार एवं समाज में आर्थिक अपराध अर्थात भ्रष्टाचार के लिये कोई स्थान न हो), भ्याभिचारमुक्त (सरकार एवं समाज में अनैतिकता के लिये कोई स्थान न हो)। आशय यह कि, भयमुक्त, मूखमुक्त, भ्रष्टाचारमुक्त, व्याभिचारमुक्त शासन ही, सुशासन है। इसमें सुशासन के सभी चिरन्तन, पुरातन, सनातन अवयव शामिल हैं।

केन्द्र में 2014 से लेकर अब तक तथा उत्तर प्रदेश में 2017 से लेकर अब तक इस दिशा में अनेक बुनियादी कदम, योजनाएँ, कार्यक्रम एवं नीतियाँ बनाया तथा उसे लागू करने का प्रयास किया है। यहाँ यह कहना समीचीन होगा कि, भारत हजारों वर्ष तक गुलाम रहने के बाद 1947 में स्वाधीन हुआ; जिससे उपरोक्त दृष्टि से अनेक प्रकार की विसंगति आयी है। इतना ही नहीं देश के आजाद होने के बाद भी शासन में लगातार ऐसे लोग आते रहे, जो अंग्रेजियत एवं अभारतीय विचारों से प्रभावित होकर कार्य करते रहे। भारत के मूल लोगों की भावनायों एवं विचारों का ध्यान नहीं रखा; जिससे देश के स्वाधीन होने के लगभग सत्तर वर्ष बाद में भय, भूख, भ्रष्टाचार, व्याभिचार का बोलबाला बना रहा और हमें 2014 या 2017 में भी उसको खत्म करने के विषय में सोचना तथा कार्य करना पड़ रहा है। आज जबकि हमें विकास एवं मानव जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने में अपने को आगे करना चाहिये था, उसके लिये नीति नियम नियोजन करने चाहिये थे; लेकिन केन्द्र एवं राज्य सरकार उस पर कम ध्यान देकर आज भी भयमुक्त, भूखमुक्त, भ्रष्टाचारमुक्त तथा व्याभिचारमुक्त सरकार तथा समाज निर्माण में लगे हुये हैं। लेकिन सुशासन के आरम्भिक मानदण्ड (भय, भूख, भ्रष्टाचार, व्याभिचार से मुक्ति दिलाने) तथा द्वितीयक मानदण्ड (चिकित्सा शिक्षा विकास के उच्चतम मानक तक पहुँचने) को प्राप्त करने में अपने नीति नियम तथा कार्यक्रम के माध्यम से वर्तमान केन्द्र की मोदी तथा उत्तर प्रदेश की मोदी सरकार सन्नद्ध है, यह प्रथम दृष्टया दिखायी पड़ता है।

(01 से 15 जनवरी 2022 के यथावत, नयी दिल्ली के अंक में प्रकाशित)

डॉ कौस्तुभ नारायण मिश्र