चरमपन्थियों की साजिश नाकाम

कृषि कानूनों की वापसी, योग्य, सराहनीय और साहसपूर्ण निर्णय माना जाना चाहिये। कार्तिक पूर्णिमा के पावन अवसर पर प्रधानमन्त्री जी द्वारा देशवासियों के लिये सुन्दर फैसला लिया गया। इस फैसले से देश की एकता और अखण्डता मजबूत हुई तथा देश को तोड़ने और भड़काने वाली ताकतें पराजित हुईं। जैसा कि सबको विदित है कि अब इस आन्दोलन में कुछ देश विरोधी शक्तियाँ भी सक्रिय हो गयी थीं और कुछ मुट्ठी भर लोग, जो वास्तविक अर्थों में किसानों के अगुआ नहीं थे, ने अपने आधारहीन आन्दोलन को गति देने के लिये देश विरोधी शक्तियों का भी सहारा लेना आरम्भ कर दिया था। भावनाओं से जुड़ा यह निर्णय  इस बात का भी सन्देश है कि जिद्द और कट्टरता से नहीं; बल्कि सबको साथ लेकर चलना और सबके हित के लिये निर्णय लेना; राजनीति और कूटनीति की दृष्टि से सूझ-बूझ का उत्तम उदाहरण है। आज हम सबका परम कर्तव्य है कि हम सब मिलकर प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी जी और उनकी सरकार को धन्यवाद ज्ञापित करें। लेकिन यह ध्यान रहे कि तीनों कृषि कानून वापस लेने से देश में यह परम्परा टूटी है कि किसी भी कानून का विरोध करने के लिये विदेशों से फन्डिंग लेकर और राष्ट्रीय राजमार्ग जाम करके सरकार को अस्थिर करने की कोशिश सरकार मान लेगी! बल्कि सरकार ऐसा निर्णय ले लेगी कि उक्त षड्यंत्र नाकाम कर देगी। किसानों की स्थिति सुधारने के लिये सुन्दर कानून मोदी सरकार लायी थी; लेकिन स्वार्थी आन्दोलनजीवी, आढ़तियों तथा दलालों ने विपक्षी दलों के साथ मिलकर किसानों की स्थिति को और बर्बाद करने का ठेका ले लिया; यह स्थिति और बदतर न हो, सरकार ने यह निर्णय लिया और आगे पुनः सोच- समझकर उक्त के सम्बन्ध में सरकार निर्णय लेगी।

 

मोदी सरकार ने तो तीनों कानून वापस लेकर रद्द कर दिये; लेकिन क्या अब किसान मर्सिडीज और बीएमडब्ल्यू से चलेंगे? क्या अब किसान आत्महत्या नहीं करेंगे? अब किसानों को उनकी फसल के बहुत अच्छी कीमत मिलेगी? क्या ठेकेदार आढ़ती गोदामखोर लाभान्वित नहीं होंगे? क्या सामान्य किसान की स्थिति सुधरेगी? निश्चित रूप से इसके उत्तर इन षड्यन्त्रकारी आन्दोलनकारियों के पास नहीं हो सकता। किसान भाइयों को समझना चाहिये कि यह युद्ध उन्हें ही लड़ना है; मुट्ठीभर ठेकेदारों और आन्दोलजीवी लोगों द्वारा यह युद्ध न लड़ा जा सकता है और न ये लोग वास्तविक अर्थों में किसान हितैषी ही हो सकते हैं। सरकारें भी हमारी ओर से नहीं लड़ेंगी; वह यदि राष्ट्रीय भावना की होगी तो ऐसे कानून बनाकर किसान भाइयों का सहयोग मात्र कर सकती है। सरकार अपनी होगी तो लड़ाई में कुछ आसानी होगी, बात केवल इतनी सी है बस! सरकार यदि हमारी या राष्ट्रवादी होगी तो वह मूक और असहाय दर्शक की भूमिका में नहीं होगी; उनकी होगी तो उनके साथ हिन्दुओं पर अत्याचार करने के लिये खड़ी होगी; उनकी कार्यसूची में किसानों का हित नहीं होगा। मोदी जी योगी जी को वोट दीजिये, पर वोट देकर घर में मत सो जाइये; आन्दोलनजीवी ठेकेदारों को समझकर व्यवहार करिये और आगे आइये। पृथ्वीराज चौहान ने सत्रह लड़ाइयाँ जीती थीं, पर इस्लाम के खतरे को समाप्त नहीं किया। उन्होंने सिर्फ एक लड़ाई जीती और उसका नतीजा सिर्फ पृथ्वीराज ने नहीं भुगता, हम सब ने उसका मूल्य चुकाया है। इस लिये सचेत हो जाने का समय है; जिससे पुनः कोई कृषि कानून आये तो हम गुमराह न हों।

 

जिस देश व्यापी गृहयुद्ध का मंसूबा तैयार किया जा रहा था; आज मोदी जी ने उन सभी मनसूबे की लगभग आधी से भी ज्यादा हवा निकाल दिया है। सबको याद होगा कि कप्तान अमरिंदर सिंह अमित शाह से बैठक करने आये थे। बहुत से लोगों ने कयास लगाया था कि अमरिन्दर सिंह जी भाजपा में शामिल होने वाले हैं; लेकिन इनकी बैठक पंजाब की तेजी से बिगड़ती स्थिति पर वार्ता के कारण हुई थी। क्या राजनीतिक विशेषज्ञों को लगता है कि सोनिया को इतनी भी समझ नहीं थी कि अमरिन्दर को हटाने के बाद पंजाब में कांग्रेस का क्या हाल होगा? पर सोनिया पर अन्तर्राष्ट्रीय दबाव था। कांग्रेस के रेस से बाहर होने के बाद, केजरीवाल जैसे खतरनाक लोमड़ी को जिताकर एक अनार्की सरकार का सीमावर्ती राष्ट्र पंजाब पर कब्जा करवाने का इनका मंसूबा था। इनकी पूरी योजना थी कि चीन, पाक, ड्रग्स, तालिबान और खालिस्तान परस्त किसी नेता को पंजाब की बागडोर सौंपी जाय। यह बात अमिन्दर सिंह अच्छी तरह से समझ चुके थे। गुरपतवन्त सिंह पुन्नू का सिख फॉर जस्टिस, आई एस आई का पीठ पीछे से साथ, कनाडा और ब्रिटेन की सरकारों का समय समय पर उन्हें उकसाने की कार्यवाही, कुछ किसान संगठनों, चरमपन्थी और कट्टर मुसलमानों की भावनाओं को भड़काकर भारत में गृहयुद्ध करवाने के योजना को मोदी समिति ने समय से पहचान लिया। उन्होंने इनकी फन्डिंग को रोकने का पूरा प्रयास किया और इसी के चलते इनको या एन जी ओ को मिलने वाले पैसे को भारतीय बैंकिंग द्वारा संचालित करने, बहुत सारे सरकारी बैंकों को चार बड़े बैंकों में मर्जर करने जैसे कदम उठाये गये। क्योंकि इन सबके कारण इनको फन्डिंग की कोई कमी न थी न होने वाली थी।

 

वर्तमान राष्ट्रवादी मोदी सरकार भारत में ही कई मोर्चों पर गद्दारों से पहले से ही लड़ रही थी। वामपन्थी विचारधारा, मुस्लिम कट्टरता, अन्य चरमपन्थी विचार के साथ तो मोदी सरकार आसानी से लड़ भी लेती और हरा भी देती; लेकिन नहीं इन छद्मवेशियों ने बड़ी चतुराई से इन सभी आन्दोलनों को किसानों के साथ जोड़ दिया; जिसके वजह से कानून को वापस लेना तात्कालिक समय की माँग थी। भारत एक कृषि प्रधान देश है और लगभग 3 बटा 4 जनसंख्या आज भी किसी न किसी रूप में किसानों से जुड़ी हुई है। भारतीय फौज में लगभग सत्तर प्रतिशत जवान किसान परिवारों से हैं; देश की आद्योगिक इकाइयों की लगभग नब्बे प्रतिशत कामगार जनता इन्हीं किसान परिवारों से आती है। लगभग एक वर्ष बाद अब सरकार के सामने छद्म किसान आन्दोलन को कुचलने के लिये इन पर सख्ती बरतने या वापस लेने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था। क्योंकि सीधे- साधे किसानों को इतनी उल्टी सीधी पट्टी पढ़ायी गयी कि उनका सरकार द्वारा किसान पक्ष में लिये गये फैसले पर विश्वास ही खत्म हो गया, ऐसा बताया गया। किसानों को लगता था कि उनकी फसल कोई नहीं खरीदेगा; एम एस पी नहीं मिलेगी; उनकी जमीनों पर कब्जा हो जाएगा आदि। अब मोदी जी ने आगे आकर सारा दोष अपने पर लेते हुए किसानों से माफी माँगकर सारे छद्म आन्दोलन की हवा ही निकाल दिया। इससे सबसे बड़ा नुकसान राकेश टिकैत को हुआ। उनको जो दिन रात फन्डिंग मिल रही थी, वह अब इससे बन्द हो गयी और यह छद्म किसान आन्दोलन फुस्स हो गया है। किन्तु क्या इन सब चीजों को मोदी जी और उनकी टीम आने वाले समय में भूल जायेगी? कृपया आने वाले समय की प्रतीक्षा कीजिये।

 

यथावत, नयी दिल्ली के दिसम्बर 1 अंक में प्रकाशित।

 

डॉ कौस्तुभ नारायण मिश्र