उत्तर प्रदेश का राजनीतिक माहौल कुछ लोगों द्वारा जिस दिशा में ले जाने का प्रयास किया जा रहा है, सच यह है कि वे लोग किसी चर्चा के पात्र तो नहीं हैं; लेकिन उनके सच को तो उजागर होना ही चाहिये। यूपी की राजनीति में छोटे दलों की क्या भूमिका है? भारतीय चुनाव आयोग ने कुछ दिन पूर्व उत्तर प्रदेश समेत कुल पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव के लिये मतदान कार्यक्रम का ऐलान कर दिया है। चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश में सात चरणों में मतदान कराने का फैसला किया है। इस घोषणा के साथ ही उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की उलटी गिनती शुरू हो गयी है। भारतीय जनता पार्टी से लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस एवं बसपा अपने-अपने स्तर पर जोर-आजमाइश कर रही हैं। लेकिन बड़ी पार्टियों के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के तमाम छोटे दल भी इस चुनाव में अपना भविष्य तलाश रहे हैं। इन दलों में जयन्त चौधरी के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय लोक दल, डॉ संजय निषाद की निषाद पार्टी, ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा और अनुप्रिया पटेल की पार्टी अपना दल शामिल है। इनका सच क्या है, अभी भी सामान्य जनता पशोपेश में है। इनके जनता उनको अधिक समझना चाहती है, जो वर्तमान केन्द्र एवं उत्तर प्रदेश सरकार की लोक कल्याणकारी नीतियों कार्यक्रमों और योजनाओं का विरोध कर रहे हैं।
भाजपा क्या योगी जी और केशव जी को सुरक्षित सीटों से मैदान में उतार रही है? ऐसा नहीं है, ये वही सीटें हैं, जहाँ से ये लोग वर्षों से चुनाव लड़ते एवं कम्पेन करते आये हैं; इसलिये इसका और अर्थ तलाशना अर्थहीन है। जहाँ तक इस पर अखिलेश यादव जी के बयान का सवाल है कि- \’योगी जी को अब उनके घर भेज दिया गया है\’; तो उनको यह जानना चाहिये कि, किसी को उनके घर भेजा या भगाया नहीं जाता है। भेजा या भगाया, घर दूर जाता है; जैसे नेता जी को 2014 में और अखिलेश जी को 2019 में आजमगढ़ भेजा या भगाया गया था। स्वामी प्रसाद मौर्य जी के बहाने, ओबीसी वोट बैंक पर सभी पार्टियों का निशाना है; लेकिन एक बात सपा को समझना चाहिये कि वे और स्वामी प्रसाद जी पिछड़े समाज के स्वयंभू और मान्य नेता हैं। भाजपा में पिछड़े समाज से इनसे बड़े- बड़े मान्य नेता पहले से विद्यमान हैं और अपने तथा सर्वसमाज के लिये इनसे बहुत बेहतर कार्य कर रहे हैं। पिछले तीन विधानसभा चुनावों के नतीजों पर ध्यान दें, तो एक बात के संकेत मिलते हैं कि उत्तर प्रदेश में मतदाता किसी एक पार्टी को बहुमत दे रहे हैं और 403 विधानसभा सीटों वाले इस राजनीतिक रूप से जटिल प्रदेश में पूर्ण बहुमत के लिये 202 सीटें जीतना जरूरी है। साल 2007 के चुनाव ने मायावती जी को 206 सीटों के साथ सत्ता पर पहुँचाया; 2012 के चुनाव में अखिलेश यादव जी को 224 सीटों के साथ मुख्यमन्त्री बनाया और 2017 में 324 सीटों के साथ योगी आदित्यनाथ जी को मुख्यमन्त्री बनाया। जैसा कि सबको विदित है कि दिसम्बर में निषाद पार्टी और बीजेपी की संयुक्त रैली में अमित शाह और योगी आदित्यनाथ जी शामिल हुये थे। पिछले चुनावों में भी गठबन्धन हुये थे, लेकिन बड़ी पार्टियों ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया था। इसलिये वर्तमान गठबन्धन को भाजपा की दृष्टि से तात्कालिक राजनीतिक मर्यादा और सपा की दृष्टि से अस्तित्व बचाने का प्रयास मात्र है।
ऐसे में सवाल उठता है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन छोटे क्षेत्रीय दलों की क्या भूमिका है? इनका राजनीतिक महत्व कितना और किस क्षेत्र में है और इस चुनाव पर ये दल क्या असर डाल सकते हैं? योगी आदित्यनाथ जी एवं केशव प्रसाद मौर्य जी की घोषणा हो चुकी है; लेकिन क्या अखिलेश यादव, प्रियंका गाँधी और मायावती लड़ेंगे चुनाव? उत्तर है, नहीं! क्योंकि उनको भय है कि वे खुद चुनाव न हार जायँ। राजभर समुदाय के प्रतिनिधित्व करने का दावा करने वाली सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेता ओम प्रकाश राजभर ने हाल ही में एक निजी चैनल के साथ इन्टरव्यू में दावा किया है कि- \’भाजपा नेता और मन्त्री सपा से टिकट मिलने की बाट जोह रहे हैं।\’ उनको यह जानना चाहिये कि स्वामी प्रसाद मौर्य जी या दारा सिंह चौहान जी न तो भाजपा के भूत थे, न वर्तमान हैं और न भविष्य हैं। भाजपा आज जितनी दिखायी पड़ रही है, उसकी जड़ उससे कई गुनी गहरी है। ये वे नेता हैं जो सामयिक राजनीतिक कारणों से आते- जाते रहते हैं; इनके आने- जाने से भाजपा जैसे विशाल वट वृक्ष का छावं कम नहीं होता। सवाल महत्वपूर्ण यह कि- क्या हाल ही में समाजवाद पार्टी के साथ गठबन्धन करने वाले ओम प्रकाश राजभर चुनाव से पहले या बाद में स्वयं भाजपा का दामन थाम सकते हैं; क्योंकि वे एक बार अपने लोगों के बीच यह बयान दे चुके हैं कि- \”समाजवादी पार्टी को वोट देने वाले, अपने घर में ही दुष्कर्म करते हैं और यही माना जायेगा।\”
वर्ष 2017 में राजभर ने बीजेपी के साथ गठबन्धन करके चार सीटें हासिल किया था और अब इस चुनाव में उनकी राजनीतिक महत्वाकाँक्षा और बढ़ी है। वास्तव में जब-जब बड़ी पार्टियाँ छोटे दलों को अपने साथ जोड़कर चुनाव में जाती हैं तो छोटे दलों को इसका फायदा मिलता है; लेकिन हमेशा छोटे दलों के नेता बड़ी पार्टियों के लिये चुनौती बनते हैं। ओमप्रकाश राजभर इस समय भाजपा के लिये चुनौती दिख रहे हैं, हैं नहीं। यदि पिछले चुनाव में ओमप्रकाश जी भाजपा के साथ नहीं लड़ते तो चाहे कितना भी दावा कर लें, आज इनकी मौजूदगी राजनीतिक सफलता के दृष्टि से आज दिखायी भी नहीं पड़ती। अनुप्रिया पटेल का \’अपना दल\’ उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से विशेषत: वाराणसी और इसके आसपास के क्षेत्र में कुर्मी वोटरों का प्रतिनिधित्व दिखाता हुआ काफी समय से भाजपा के साथ गठबन्धन में है। कांशीराम के साथ काम कर चुके डॉक्टर सोने लाल पटेल ने साल 1995 में अपना दल की स्थापना की थी; लेकिन इस समय अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल हैं। इसका आशय है कि ऐसा समाज पूरी तरह भाजपा की ओर उन्मुख है; क्योंकि बहन मायावती जी भी वी वी आई पी अतिथि गृह काण्ड एवं पिछले चुनाव में असफल गठजोड़ के बाद भाजपा के साथ ही खड़ी दिखायी पड़ रहीं है; क्योंकि वास्तविक अर्थों में गरीब बंचित शोषित समाज अपनी सहज स्वाभाविक छाँव किसी न किसी रूप में भाजपा में ही तलाश रहा है। इन सबका आशय है कि आगामी चुनाव में भाजपा बढ़त में है और जनता को भाजपा के केन्द्रीय एवं उत्तर प्रदेश के राज्य नेतृत्व पर पूरा भरोसा दिखायी पड़ रहा है।
यथावत, नयी के 16-31 जनवरी 2022 के अंक में प्रकाशित।
डॉ कौस्तुभ नारायण मिश्र
