पाकिस्तान या नापाकिस्तान

कहा जा रहा है कि अमेरिकी सांसदों ने पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित करने के लिये बिल पेश किया है। अनेक दृष्टियों से इसे इसे भारत का सफलतम कूटनीतिक प्रयास कहना चाहिये। यद्यपि हो सकता है कि अन्तर्राष्ट्रीय समुदायों से पाकिस्तान के पक्ष और विपक्ष में अनेक प्रकार के बयान सामने आयें; लेकिन आने वाले ऐसे प्रत्येक बयान को भारत के लिये शुभ संकेत कहे आ सकते हैं। क्योंकि ऐसा यदि कोई भी बयान आयेगा तो पाकिस्तान के साथ आतंकवाद शब्द का जिक्र अवश्य होगा। यदि ऐसा होता है तो पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति पर चोट होकर बिखरने का खतरा मंडराता सा दिखायी देगा। वास्तव में पाकिस्तान अब एक फर्जी एवं काल्पनिक देश मात्र रह गया है। चौदह अगस्त 1947 से विश्व मानचित्र के पटल पर उभरा पाकिस्तान दरअसल कोई देश नहीं बल्कि भारतीय भू-भाग का एक टुकड़ा है, जो एक सीमा रेखा खींचकर धर्म के नाम पर सिर्फ दिखावें को मजहब के सहारे खड़ा हुआ। ऐसा इसलिये किया और कराया गया कि भारत से अलग हो अपने मजहबी मूल्यों की रक्षा की जा सके। समय के साथ पाकिस्तान में मजहबी मूल्यों का तो पता नहीं, किन्तु मानवीय मूल्य बिखरते टूटते जरुर नजर आये जो, किसी मजहब या पन्थ का न सही; लेकिन धर्म की सबसे बड़ी पूँजी एवं शक्ति होती है। पाकिस्तान में मजहब के नाम पर एक बड़ा जाल फैलता गया। वहाँ जितने बड़े मुल्ला या मौलवी, उसे उतनी बड़ी इमदाद का कारोबार सा सामाजिक और राजनितिक स्तर पर चलता चला आया। यही वह वजह है, जिससे आज पाकिस्तान एक आतंकी देश के रूप में निरन्तर स्थापित होता आया।

भारत के बँटवारे के बाद पाकिस्तानी शासकों की कोशिश  थी कि हम भारतीय उपमहाद्वीप से कटकर सांस्कृतिक, धार्मिक रूप से तो मध्य एशिया के इस्लामिक देशों के पलड़े में चले जाये और राजनीतिक रूप से विश्व शक्तियों के पाले में रहकर भारत के बराबर अपनी पहचान बनायें। इसमें वे काफी हद तक सफल और असफल दोनों हुए। एक ओर अमीर इस्लामिक देशों से पन्थ के नाम पर खूब चन्दा इकट्ठा किया तो, रूस और अमेरिका जैसी महाशक्तियों के टकराव का फायदा उठाकर हथियारों का जखीरा भी इकट्ठा कर लिया; किन्तु इसका नुकसान भी पाकिस्तान को बहुत उठाना पड़ा। चूँकि पाकिस्तान उनको उस समय के भारतीय परिक्षेत्र से अमानत के रूप में मिला था। वर्ष 1947 के बाद साझे इतिहास, भूगोल से बाहर आये पाकिस्तान को चाहे वह इतिहास हो या उनकी भाषा, धर्म, कला, रहन-सहन, रीति-रिवाज आदि; पाकिस्तान अपनी आत्म-पहचान को अभिव्यक्त करने या दावेदार बनने के लिये जिस दिशा में भी जाता, वहाँ वे भारत की लम्बी गहरी छाया उस पर विद्यमान पाते गये। जिससे वे अपने को भारत से भिन्न साबित करने के लिये तरह-तरह के अजीब साधनों एवं उपायों का सहारा लेने लगे। विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम में वे इतिहास को विकृत करते गये तथा माने गये तथ्यों एवं आँकड़ों को तोड़-मरोड़ कर रखते गये। इस कारण उन्होंने अपने इतिहास में भारत के दुश्मन गौरी, गजनवी, मोहमद बिन कासिम जैसे लुटेरों एवं अभारतीयों को अपना आदर्श लिखना शुरू किया; जिनका भारत में व्यापक मतान्तरण का इतिहास रहा है और मूल भारतवंशियों की अभारतीय बनाया गया।

इस हेतु उन्होंने न तो सिन्ध का असली इतिहास स्वीकारा, न ही बलूच लोगों का! पख्तूनी लोगों की तो बात ही छोड़ दीजिये। कुल मिलाकर उन्होंने अपने इतिहास को अन्य धर्मो खासकर हिन्दू धर्म एवं भारतीय मानसिकता के खिलाफ बना डाला; जिससे आने वाली पीढ़ी बँटवारे का असली कारण न पूछ पाये और न जान पाये। आरम्भ में तो इसका लाभ जितना सियासी जमातों को मिला, उतना ही मजहबी तंजीमों को भी मिला; लेकिन बाद में सियासी जमातों से ज्यादा मुल्ला मोलवियों को मिलने लगा। जिस कारण वहाँ का लोकतन्त्र, सत्ता और सेना मजहबी रंग से रंग पुतकर खड़ी होती चली गयी। जब सत्ता के ऊपर मजहब और भाषा दोनों ताकत के बल पर हावी हुई तो उसकी हानि पाकिस्तान को बांग्लादेश के अलगाव के रूप में उठानी भी पड़ी। कारण कि पाकिस्तान का पाकिस्तान में भाषा और नेताओं के अलावा कुछ नहीं था। सिन्ध, पंजाब, करांची, बलूचिस्तान और पख्तूनी इलाका सबकी अपनी अलग-अलग भाषा, सांस्कृतिक विरासत थी; जो अपने भाषाई व अन्य सांस्कृतिक परम्पराओं पर होने वाली चोट पर उखड़ने लगे और इस टूटन को सम्हालने के लिये पाकिस्तानी हुक्मरानों को सेना का सहारा लेना पड़ने लगा। भारत में यह स्थिति बिल्कुल भिन्न रही है; क्योंकि यहाँ एक ही अनेक हुये हैं। भारत में इनका मूल स्रोत एक रहा है। जबकि पाकिस्तान में इनके मूल स्रोत रहे हैं; इसलिये इनके टूटते रहने के कारण तो खड़े होते रहे; जुड़ने के कारण का अभाव बना रहा। पाकिस्तान में जहाँ भी राजनीतिक और मजहबी तंजीमे अपने अधिकार या अपनी सांस्कृतिक विरासत और भाषा के लिये खड़ी होतीं, वहीं सेना को उतार दिया जाता, विद्रोह को कुचला जाता। इससे पाकिस्तान की राजनीति में सेना का बड़ा हस्तक्षेप बढ़ता गया। जिसने पाकिस्तान में अनेक बार लोकतान्त्रिक मूल्यों पर भी हमलाकर लोकतन्त्र का मजाक बनाया। लोकतन्त्र को कैद के बाद रिहा भी किया तो हमेशा इस शर्त पर किया कि सेना की छत्र-छाया में ही या एक निश्चित दायरे में रहकर ही शाशन का हिस्सा बनना पड़ेगा! मतलब प्रशासनिक स्तर पर सेना और सामाजिक जीवन पर मजहब हावी हो गया और जिसके बीच से वहाँ की राजनीति के गुजरते रहने की नियति बन गयी।

वास्तव में पाकिस्तान के लोगों ने कुछ ही छण आजादी का सूरज देखा; बाद में उन्हें सेना और मजहब के ठेकेदारों ने अपने व्यक्तिगत सुख के लिये सुरक्षा का हवाला देकर सदैव के लिये अस्त कर दिया। धीरे-धीरे नफरत की शिक्षा की फसल पकनी शुरू हुई, जो भारत के लिये बोई गयी थी। भारत में तो जो किया वो किया इसके बाद उसने अपने इसी नफरती बीज पाकिस्तान में भी बिखेरने शुरू किये तो पाकिस्तान ने विश्व स्तर पर खुद को आतंकवाद से त्रस्त देश का रोना रोकर हर बार बच निकलने का प्रयास किया। जिसके बदले उसे वैश्विक सहानुभूति और आर्थिक सहायता राशि मिलना आरम्भ हो गयी। शीत युद्ध के दौरान या तालिबान के खात्मे के समय अमेरिका को पाकिस्तान की जमीन उपयोग करने को मिली तो, पाकिस्तान को बदले में पैसा। जिस पैसे को उसने भारत के खिलाफ छदम युद्ध शुरू करने और हथियार खरीदने में गवा दिया। आज पाकिस्तान में एक ओर पाकिस्तान का खोखला लोकतन्त्र, दूसरी ओर मजहबी तंजीमें, तो तीसरी ओर पाकिस्तान की सबसे बड़ी धुरी सेना बनी हुई है। इनके बीच खड़ी है पाकिस्तान की जनता जो शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य जैसे मूलभूत अधिकारों के लिये तरस रही है और यही वह कारण है जो पाकिस्तान को वैश्विक आतंकी देश का दर्जा दिला पाये या न दिला पाये; लेकिन पाकिस्तान को सिन्ध, पंजाब, पख्तून, बलोच आदि में टूटने की नियति तक लगभग पहुँचा चुका है। तो क्या यह सवाल है कि पाकिस्तान अपना अस्तित्व स्वयं के खामियों से मिटा देगा? बांग्लादेश का विभाजन एवं इस समय बांग्लादेश से भारत से अच्छे सम्बन्ध यह प्रमाणित करते हैं कि भारत की वर्तमान विदेश नीति ने इस पर देश हित में एवं स्वयं पाकिस्तानी लोगों के हित मे सराहनीय कार्य किया है। इसका उत्तर तो भविष्य के गर्भ में है; लेकिन इसकी नींव पड़ चुकने में कोई सन्देह शेष नहीं है। पाकिस्तान अभी आतंकी देश घोषित हो या न हो, इमरान खान और इनसे पूर्व में जो कुछ हुआ है, वह भी इसी तरफ संकेत करता है।

डॉ कौस्तुभ नारायण मिश्र

युगवार्ता, नयी दिल्ली 1- 15 अप्रैल 2022 में प्रकाशित।