पत्रकारिता के सभी माध्यमों में समन्वय

 

समाचार संस्था (न्यूज एजेन्सी) वह है, जो समाचार एकत्रित कर उसे समाचारपत्रों, पत्रिकाओं और रेडियो व टेलीविजन प्रसारकों को देता या बेचता है। समाचार संस्थाओं को समाचार सेवा (न्यूज सर्विस) भी कहा जाता है। विश्व में बहुत सारी समाचार संस्थाएँ हैं- रॉयटर्स, पीटीआई, आईएएनएस, एअनआई, हिन्दी न्यूज 9 (एच एन 9), एस पी आई, सत्यपथ ऑफ इंडिया इत्यादि। इसे प्रेस एजेन्सी, प्रेस एसोसिएशन, वायर सर्विस या समाचार सेवा भी कहा जाता है अर्थात जो एकत्र करता है, लिखता है और वितरित करता है। एक देश या दुनिया भर से समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, रेडियो और टेलीविजन प्रसारकों, सरकारी एजेन्सियों और अन्य उपयोगकर्ताओं के काम आने वाले समाचार। यह सामान्यतया स्वयं समाचार प्रकाशित नहीं करता है; लेकिन अपने ग्राहकों को समाचार प्रदान करता है, जो लागत साझा करके, ऐसी सेवाएँ प्राप्त करते हैं। सब मास- मीडिया अधिकांश समाचारों के लिये एजेन्सियों पर निर्भर करता है; यहाँ तक ​​कि वे कुछ भी जिनके पास अपने स्वयं के व्यापक समाचार-संग्रह संसाधन हैं। कुछ बड़े शहरों में, समाचार पत्र, रेडियो और टेलीविजन, पुलिस स्टेशन, अदालतों, सरकारी कार्यालयों, और इसी तरह के समाचारों की नियमित कवरेज प्राप्त करने के लिये सेना में शामिल हो गये हैं। राष्ट्रीय एजेन्सियों ने स्टॉक-मार्केट, कोटेशन, खेल परिणामों और चुनाव रिपोर्टों को इकट्ठा, वैश्विक समाचारों को वितरित करके इस तरह के कवरेज के क्षेत्र को बढ़ाया है। समाचार व्याख्या, विशेष कॉलम, समाचार तस्वीरें, रेडियो प्रसारण के लिये ऑडियो टेप रिकॉर्डिंग और अक्सर टेलीविजन समाचार रिपोर्टों के लिये वीडियो टेप या मोशन-पिक्चर फिल्म को शामिल करने के लिये भी सेवा में वृद्धि हुई है। कई एजेंसियां ​​सहकारी समितियाँ हैं और यह प्रवृत्ति उस दिशा में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से रही है।

 

सामान्य समाचार एजेंसियों के अलावा, कई विशिष्ट सेवाओं का भी विकास हुआ है। अकेले संयुक्त राज्य अमेरिका में यह संख्या 100 से अधिक है, जिनमें विज्ञान सेवा, धार्मिक समाचार सेवा, यहूदी टेलीग्राफिक एजेन्सी और समाचार चुनाव सेवा जैसी प्रमुख सेवाएँ शामिल हैं।

कुछ विशिष्ट एजेन्सियों के पास दुनिया के सभी क्षेत्रों में अनुभवी पत्रकारों को तैनात करने के लिये वित्तीय संसाधन हैं, जहाँ समाचार नियमित रूप से विकसित होते हैं। समाचार एजेन्सियों का साम्यवादी देशों में अपनी राष्ट्रीय सरकारों के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है और वे अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिये इनका उपयोग एवं दुरुपयोग करती रही हैं। था। टास, सोवियत समाचार एजेन्सी, विश्व समाचार का प्रमुख पूर्वाग्रही स्रोत रही है। सोवियत संघ और उसके सहयोगी; इसने सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी की नीति को भी जाना। चीन की सिनहुआ एजेन्सी ने भी यही किया है। प्रमुख एजेन्सियों से, 1951 में एसोसिएटेड प्रेस द्वारा अग्रणी टेलीटाइपसेटर सेवा, समाचार-सेवा प्रसारण से सीधे कम्प्यूटरीकृत टाइपसेटिंग करने के इच्छुक समाचार पत्रों के लिये उपलब्ध थी। दुनिया के एक कोने की खबर दूसरे कोने तक पहुँचाने का काम आसान नहीं रहा है। प्रत्येक पत्र-पत्रिका के लिये भी यह सम्भव नहीं कि वो हर छोटी-बड़ी जगह पर अपने संवादाता तैनात कर सकें। इस मुश्किल को आसान बनाती हैं, समाचार संस्थाएँ और समाचार समितियाँ। स्थापित धारणा के अनुसार, न्यूज एजेन्सी या ‘समाचार संस्था एक उद्यम है, जिसका प्रमुख उद्देश्य समाचार एवं समसामयिक जानकारी एकत्र करना और तथ्यों को प्रस्तुत करना है तथा उन्हें समाचार, प्रकाशन संस्थाओं को या अन्य उपभोक्ताओं को इस दृष्टिकोण से वितरित करना है कि उन्हें व्यावसायिक एवं नियमानुकूल स्थितियों में मूल्य चुकाकर सम्पूर्ण और निष्पक्ष समाचार मिल सकें।’ समाचार समितियाँ एक ही समाचार को अपने सभी उपभोक्ताओं तक एक साथ पहुँचा देती हैं। इनके सहयोग के बिना पत्र पत्रिकाओं के लिये भी अपने प्रकाशन नियमित रख पाना सम्भव नहीं है। संचार टेक्नोलाजी में लगातार होते परिवर्तनों के साथ-साथ इन्होंने भी अपने तौर तरीकों में बदलाव किया है।

 

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक तक भारत में पायनियर, स्टेट्समैन, इंग्लिशमैन तथा इण्डियन डेली न्यूज नामक चार प्रमुख अंग्रेजी पत्र प्रकाशित होते थे। पायनियर इन चारों में विशिष्ट तथा अधिक लोकप्रिय था। अत: स्टे्टसमैन, इंग्लिशमैन व इण्डियन डेली न्यूज ने मिलकर 1905 में एसोसिएटेड प्रेस ऑफ इण्डिया (एपीआई) की स्थापना की। रायटर ने 1915 में इसका अधिग्रहण कर लिया तो राष्ट्रवादी विचारधारा के कुछ लोगों ने मिलकर 1927 में ‘फ्री प्रेस एजेन्सी ऑफ इण्डिया’ का गठन किया । यह समिति भी 1935 में बन्द हो गयी । सितम्बर 1933 में कोलकत्ता में यूनाइटेड प्रेस ऑफ इण्डिया की स्थापना हुई। यूपीआई ने ही सर्वप्रथम महात्मा गाँधी की हत्या का समाचार दिया था; लेकिन आर्थिक संकट के कारण यह भी 1958 मे बन्द हो गयी। प्रेस ट्रस्ट ऑफ इण्डिया (पीटीआई) भारत ही नहीं एशिया की सबसे बड़ी अँग्रेजी समाचार समितियों में एक है। पीटीआई का पंजीकरण अगस्त 1947 में हो गया था; किन्तु इसने काम एक फरवरी 1949 से शुरू किया और तीन वर्ष तक रॉयटर के साथ अनुबन्ध में रहने के बाद 1951 में स्वतन्त्र रूप से काम करना शुरू कर दिया। पीटीआई के एकाधिकार के चलते समाचारों की निष्पक्षता पर सवाल न उठे, इसलिये प्रतिस्पर्घा बनाए रखने के लिए 1961 में यूएनआई का गठन हुआ। यूनीवार्ता, भाषा, इण्डिया, एब्रोड न्यूज सर्विस (आईएएनएस) मूलरूप में प्रवासी भारतीयों के लिये समाचार उपलब्ध कराने वाली इस समाचार समिति ने अब देश में भी अपना विस्तार करना शुरू कर दिया है। पत्रकारिता आधुनिक सभ्यता का एक प्रमुख व्यवसाय है, जिसमें समाचारों का एकत्रीकरण, लिखना, जानकारी एकत्रित करके पहुँचाना, सम्पादित करना और सम्यक प्रस्तुतीकरण आदि आते हैं। बदलते वक्त के साथ बाजारवाद और पत्रकारिता के अन्तर्सम्बन्धों ने पत्रकारिता की विषय-वस्तु तथा प्रस्तुति शैली में व्यापक परिवर्तन किये हैं। पत्रकारिता शब्द अंग्रेजी के \’जर्नलिज्म\’ का हिन्दी रूपान्तर है। शब्दार्थ की दृष्टि से \’जर्नल\’ का अर्थ है, \’दैनिक\’।

 

पत्रकारिता लोकतन्त्र का अविभाज्य अंग है। प्रतिपल परिवर्तित होने वाले जीवन और जगत का दर्शन पत्रकारिता द्वारा ही सम्भव है। परिस्थितियों के अध्ययन, चिन्तन-मनन और आत्माभिव्यक्ति की प्रवृत्ति और दूसरों का कल्याण अर्थात लोकमंगल की भावना ने ही पत्रकारिता को जन्म दिया। पत्रकारिता वह धर्म है, जिसका सम्बन्ध पत्रकार के उस धर्म से है, जिसमें वह तत्कालिक घटनाओं और समस्याओं का अधिक सही और निष्पक्ष विवरण पाठक के समक्ष प्रस्तुत करता है। तथ्यों, सूचनाओं एवं विचारों को समालोचनात्मक एवं निष्पक्ष विवेचन के साथ शब्द, ध्वनि, चित्र, चलचित्र, संकेतों के माध्यम से देश-दुनिया तक पहुँचाना ही पत्रकारिता है। यह एक ऐसी कला है जिससे देश, काल और स्थिति के अनुसार समाज को केन्द्र में रखकर सारगर्भित एवं लोकहितकारी विवेचन प्रस्तुत किया जा सकता है, किया जाता है और किया जाना चाहिये। सत्य की आधार शीला पर पत्रकारिता का कार्य आधारित होता है तथा जनकल्याण की भावना से जुड़कर पत्रकारिता सामाजिक परिवर्तन का साधन बनती है। सामाजिक सरोकारों तथा सार्वजनिक हित से जुड़कर ही पत्रकारिता सार्थक बनती है। सामाजिक सरोकारों को व्यवस्था की चौकठ तक पहुँचाने और प्रशासन की जनहितकारी नीतियों तथा योजनाओं को समाज के सबसे निचले तबके तक ले जाने के दायित्व का निर्वाह ही सार्थक पत्रकारिता है। पत्रकारिता के इतिहास पर नजर डाले तो स्वतन्त्रता के पूर्व पत्रकारिता का मुख्य उद्देश्य स्वतन्त्रता प्राप्ति का लक्ष्य था। स्वतन्त्रता के लिए चले आन्दोलन और स्वाधीनता संग्राम में पत्रकारिता ने अहम और सार्थक भूमिका निभायी। उस दौर में पत्रकारिता ने पूरे देश को एकता के सूत्र में पिरोने के साथ-साथ पूरे समाज को स्वाधीनता की प्राप्ति के लक्ष्य से जोड़े रखा। इण्टरनेट और सूचना के आधिकार के कारण आज मीडिया आज बहुत सशक्त, स्वतन्त्र और प्रभावकारी हो गया है। पत्रकारिता की पहुँच और आभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का व्यापक इस्तेमाल आमतौर पर सामाजिक सरोकारों और भलाई से ही जुड़ा है, किन्तु कभी कभार इसका दुरपयोग भी होने लगा है।

 

संचार क्रान्ति तथा सूचना के आधिकार के अलावा आर्थिक उदारीकरण ने पत्रकारिता के चेहरे को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। विज्ञापनों से होनेवाली अथाह कमाई ने पत्रकारिता को काफी हद्द तक व्यावसायिक बनाया है। मीडिया का लक्ष्य आज आधिक से आधिक कमाई का हो चला है। मीडिया के इसी व्यावसायिक दृष्टिकोण का नतीजा है कि उसका ध्यान सामाजिक सरोकारों से कहीं भटक गया है। मुद्दों पर आधारित पत्रकारिता के बजाय आज इन्फोटमेन्ट ही मीडिया की सुर्खियों में रहता है। इण्टरनेट की व्यापकता और उस तक सार्वजनिक पहुँच के कारण उसका दुष्प्रयोग भी होने लगा है। एक ओर जहाँ सूचना के आधिकार ने पत्रकारों और पत्रकारिता की धार को पैना बनाया तो, दूसरी ओर पत्रकारिता की आड़ में इनका प्रयोग ’ब्लैकमेलिंग\’ जैसे गलत उद्देश्य के लिए भी होने लगा है। समय-समय पर हुये कुछ ’स्टिंग ऑपरेशन\’ और कई बहुचर्चित सीडी काण्ड इसके उदाहरण हैं। स्टिंग पत्रकारिता के सन्दर्भ में फोटो जर्नलिज्म या फोटो पत्रकारिता से जुड़े जासूसों, जिन्हें \’पापारात्सी\’ कहते हैं, की भी आज चर्चा जोरों पर है। पत्रकारिता के बहुत से आयाम है, जैसे- खेल पत्रकारिता, महिला पत्रकारिता, बाल-पत्रकारिता, आर्थिक पत्रकारिता आदि। इनमें समय के साथ- साथ तेजी आयी है तो इसके मूल्य में गिरावट भी आयी है। समाचार संस्थाओं, समितियों या पत्र- पत्रिकाओं अर्थात संस्थागत या असंस्थागत किसी भी प्रकार की पत्रकारिता के लिये अब अपरिहार्य हो गया है कि- पत्रकारिता के मूल्यों, पत्रकार हेतु योग्यता और उत्तरदायित्व, सक्रियता और तन्मयता, समाचारों के सभी आयामों के बीच साहचर्य एवं विश्वसनीयता, समाचारों की वस्तुनिष्ठता, समाचारों के विश्लेषणात्मक क्षमता, पत्रकार का भाषा पर अधिकार आदि विषयों पर न केवल पुर्नविचार हो; बल्कि चौथे स्तम्भ की मूल्य एवं मर्यादा के अनुरूप इनका पालन सुनिश्चित कराया जाय। तकनीकि तीव्रता ठीक है; लेकिन ऐसी तीव्रता नहीं चाहिये जो, दुर्घटना का कारण बने और जिससे समाज तथा देश का वर्तमान या भविष्यगामी नुकसान हो।

 

डॉ कौस्तुभ नारायण मिश्र

 

यह लेख \’युगवार्ता\’, नयी दिल्ली के 16-30 अप्रैल 2022 के अंक में प्रकाशित है।