ज्ञानवापी के ज्ञान से सुधरता इतिहास

 

किसी बात को बदलने और किसी बात को सुधारने में बड़ा अन्तर होता है। पहले देश के सामाजिक सरोकारों को, सांस्कृतिक मूल्यों को और कुल मिलाकर इतिहास को बदलने की कोशिश की गई और अब उसे देश एवं युग के अनुरूप सुधारा जा रहा है। जिनको यह समस्या है कि, पूरब मुँह करें तो ज्ञानवापी का पचड़ा और पश्चिम मुँह करें तो ताजमहल का लफड़ा है, वे इसके लिए परेशान हैं; इसलिये कि उनके काल्पनिक रहनुमाओं ने गलती किया है। प्रश्न यह नहीं है कि ताजमहल किसका है? वह आज भी देश का है और कल भी देश का रहेगा! प्रश्न यह है कि इसका सही इतिहास क्या है? प्रश्न यह है कि यह झूठ हमसे किसने और क्यों बोला या इसका झूठा इतिहास हमें क्यों बताया एवं पढ़ाया गया? प्रश्न यह भी है कि झूठा इतिहास पढ़ाने वाले लोगों ने और क्या- क्या झूठ बोला और पढ़ाया है? प्रश्न है यह झूठ आज भी हमारे शिक्षण संस्थानों और अन्य जगहों पर कैसे चल रहे हैं? हमें सच इसलिए जानना है; क्योंकि हमें हमारे इतिहास का सच जानना हमारा अधिकार है। यदि यह सच है, तो स्कूलों में यह पढ़ाओ कि ताजमहल पहले राजा मानसिंह का महल था, जिसे शाहजहाँ ने छीना और बाद में वर्षों तक थापर और हबीब जैसे कम्युनिस्टों ने झूठी कहानी गढ़कर उसे मुगल आर्किटेक्ट एवं प्यार की निशानी बताया। ताजमहल वास्तव में भारत में आक्रांताओं के आतंक और कम्युनिस्ट इतिहासकारों के झूठ का प्रतीक है; इतिहास के साथ हुए बलात्कार का प्रतीक है। आज भारत का इतिहास, भारत का समाज, भारत की संस्कृति, भारत की सभ्यता न्याय माँगने देश एवं न्यायालय के दरवाजे पर खड़ी है। गनीमत कहिये कि, आज न्याय माँग रहा है; कल जब इतिहास स्वयं न्याय करेगा तो कुछ को बहुत महँगा पड़ेगा।

ज्ञानवापी की उत्पत्ति तब हुई थी, जब धरती पर माता गंगा और यमुना नहीं थी और जीव पानी के लिये बूंद-बूंद तरसता था, तब भगवान शिव ने स्वयं अपने अभिषेक एवं जीवों के कल्याण के लिये त्रिशूल चलाकर जल निकाला और यहीं पर भगवान शिव ने माता पार्वती को ज्ञान दिया। इसीलिये इसका नाम ज्ञानवापी पड़ा और जहां से जल निकला उसे ज्ञानवापी कुण्ड कहा गया। ज्ञानवापी का उल्लेख पुराणों में भी मिलता है? प्रश्न है कि यह नाम मस्जिद के साथ कैसे जुड़ गया? वापी का अर्थ होता है तालाब। ज्ञानवापी का सम्पूर्ण अर्थ है ज्ञान का तालाब। काशी में कुल छः वापियों का उल्लेख पुराणों में मिलता है- ज्येष्ठावापी; ज्ञानवापी; कर्कोटक वापी; भद्रवापी; शंखचूड़ा वापी; सिद्ध वापी। इनकी आगे कभी विस्तार से चर्चा की जायेगी। तात्पर्य यह कि ज्ञानवापी का जल भगवान शिव का ही स्वरूप है। पुराण न जाने कितनी सदियों पहले लिखे गये और ये इतिहास के व्यवस्थित आधार हैं, उसमें भी ज्ञानवापी को भगवान शिव का स्वरूप बताया गया है; लेकिन आज और अब आप सुन रहे हैं कि \’ज्ञानवापी\’ मस्जिद का नाम है। आक्रांताओं के आक्रमण से पहले काशी को अविमुक्त और भगवान शिव को अविमुक्तेश्वर कहा जाता था। काशी में अविमुक्तेश्वर की पूजा होती थी, जिन्हें आदिलिंग कहा जाता है। लेकिन आक्रांताओं ने काशी के मन्दिरों को अनेक बार नष्ट किया। मुहम्मद गोरी ने कुतुबुद्दीन ऐबक को बनारस विजय के लिये भेजा, जिसमें 1000 से भी अधिक मन्दिर तोड़े गये और मन्दिर की सम्पत्ति को 1400 ऊंटों पर लादकर मोहम्मद गोरी को भेजा गया। लेकिन 1296 आते -आते, बनारस के मन्दिर फिर से बन गये और फिर से काशी की शोभा बढ़ाने लगे। बाद में अलाउद्दीन खिलजी के समय, बनारस के मन्दिर फिर से तोड़े गये। चौदहवीं सदी में तुगलक शासकों एवं पंद्रहवीं शताब्दी में सिकन्दर लोदी के समय में भी मन्दिरों को तोड़कर उनके ढांचे एवं उनके मलबों पर जौनपुर और बनारस में अनेक मस्जिदों का निर्माण हुआ।

सोलहवीं सदी में अकबर के शासन में उसके वित्तमंत्री टोडरमल ने अकबर को बिना बताये अपने गुरु नारायण भट्ट के आग्रह पर 1585 में विश्वेश्वर का मन्दिर बनवाया, जिसके बारे में कहा जाता है कि यही काशी विश्वनाथ का अब का मन्दिर है। टोडरमल ने विधिपूर्वक विश्वनाथ मन्दिर की स्थापना ज्ञानवापी क्षेत्र में कराया; लेकिन अकबर के भय से मन्दिर तोड़कर बनवाई गई ज्ञानवापी मस्जिद का नामोनिशान बना रहने दिया। इसी जमाने मे जयपुर के राजा मानसिंह ने बिन्दुमाधव का मन्दिर बनवाया; लेकिन दोनों भव्य मन्दिरों को औरंगजेब के शासन में 1669 में फिर से तोड़ दिया गया और चार बड़ी मस्जिदें बनवाई गई। इसमें विश्वेश्वर मन्दिर की जगह जो मस्जिद बनी, उसे ज्ञानवापी मस्जिद कहा जाता है। एक ब्रिटिश अधिकारी जेम्स प्रिनसेप ने 1820-1830 के बीच सर्वेक्षण करके जो मानचित्र बनवाया, उसमें कहीं भी मस्जिद का उल्लेख नहीं है और इस नक्शे के अनुसार मन्दिर प्रांगण के चारों कोनों पर तारकेश्वर, मनकेश्वर, गणेश और भैरव के मन्दिर दिख रहे हैं; बीच का हिस्सा गर्भगृह है, जहां शिवलिंग स्थापित है। प्रश्न यह है कि नन्दी जी मस्जिद की तरफ क्यों देख रहे हैं? जबकि काशी विश्वनाथ मन्दिर तो उनके पीछे स्थित है। नन्दी तो सदैव शिवलिंग की तरफ देखते है! कृपया इस हेतु ऊपर की बातों का पुनः अवलोकन करें। ज्ञानवापी कुण्ड का उल्लेख, पंचकोसी परिक्रमा में और मध्यकाल की पुरानी कलाकृतियों में भी है। काशी के ज्ञानवापी मस्जिद का मामला 1936 मे कोर्ट भी पहुंचा था; लेकिन 1937 में वाराणसी की जिला अदालत ने मुस्लिम पक्ष की अपील को खारिज करते हुए कहा- \’ ज्ञानकूप के उत्तर में ही भगवान विश्वनाथ का मन्दिर है; कोई दूसरा ज्ञानवापी कूप बनारस में नहीं है, एक ही विश्वनाथ मन्दिर है, जो ज्ञानवापी परिसर के अन्दर है।\’ मन्दिर को बार-बार गिराये जाने का उल्लेख, नारायण भट्ट ने 1585 में अपनी संस्कृत में लिखित पुस्तक \’त्रिस्थली सेतु\’ में भी किया है।

विध्वंस और मस्जिद का अस्तित्व हमारे तीर्थ की सत्यता पर आखिर भारी क्यों पड़ गया? जब वहां शिवलिंग का प्राकट्य हुआ। आज प्रत्येक हिन्दुस्तानी हर्षोल्लास से भरा है; लेकिन इस बीच हमें इस धर्म युद्ध के सबसे बड़े योद्धा व्यास परिवार को स्मरण में रखना पड़ेगा। आदरणीय स्व सोमनाथ व्यास, अनेक दुर्लभ पांडुलिपियों एवं ग्रंथों के रचयिता आदरणीय स्व केदारनाथ व्यास को, जिन्होंने वर्षों से ज्ञानवापी की कानूनी लड़ाई लड़ा। ज्ञानवापी की सम्पत्ति पर मालिकाना हक और स्थापत्य स्व केदारनाथ व्यास के परिवार का रहा है। इन्हीं व्यास परिवार के कारण सन 1936 में दीन मोहम्मद को पूरे ज्ञानवापी में नमाज पढ़ने के दावे को नकार कर कोर्ट ने वापस लौटाया था और ज्ञानवापी परिक्षेत्र को वक्फ बोर्ड की सम्पत्ति होने से इंकार किया था। एक बात जानिये, जब आक्रांताओं ने हम पर हमला किया तो, हम कोई गरीब देश नहीं थे; जब अंग्रेजों ने देश पर कब्जा किया तब भी हम गरीब नहीं थे; लेकिन जब अंग्रेज इस देश से गये तब हम गरीब हो गये। सन 1942 में जब सत्तर लाख लोग बंगाल में अकाल में भूख से मर गये तब हम गरीब थे! हम गरीब कैसे हुए? क्यों भूखों मरे? क्या हमारी धरती ने अन्न उपजाना बन्द कर दिया था? क्यों 10 से 15 प्रतिशत बच्चे पैदा होने के साल भर के अन्दर कुपोषण से मर जाते थे? हमने क्या खोया? समृद्धि या आजादी? क्या पाया? समृद्धि या आजादी? क्या राणा प्रताप ने अकबर से कम टैक्स लगाने की मांग किया था? क्या शिवाजी दाल प्याज के बढ़ते दाम के खिलाफ लड़े थे? क्या भगत सिंह ने अंग्रेजों से डीजल पेट्रोल का दाम कम करने हेतु लड़े थे? यह झूठ है कि बिजली, पानी, सड़क और नौकरी, आजादी और आत्मसम्मान से अपेक्षाकृत बड़े मुद्दे हैं। बिना आजादी के किसी को समृद्धि न मिली है, न मिल सकती है और यदि मिलती भी है तो उसका कोई मूल्य नहीं होता है। ज्ञानवापी का संघर्ष केवल एक मन्दिर या भवन के स्वामित्व का मात्र संघर्ष नहीं है! इस प्रश्न में सिर्फ अतीत में हुई क्रूरताएं और अत्याचार ही शामिल नहीं हैं; बल्कि हमारे इतिहास, हमारी संस्कृति के साथ हुए और हो रहे अन्याय का प्रश्न भी शामिल है। यह इतिहास का बदला लेने या बदलने की जिद मात्र नहीं है, यह सुधार का प्रशस्त मार्ग है; जो इतिहास संस्कृति एवं सभ्यता के नैरेटिव को यथार्थ और सत्य के आलोक में स्थापित करने का उपक्रम है; इसलिये हम इस दिशा में खड़े हैं।

डॉ कौस्तुभ नारायण मिश्र

(यह लेख युगवार्ता, नई दिल्ली के 01 से 15 जून 2022 के अंक में प्रकाशित है।)