दीपावली उत्सव का उत्स

दीप एवं सहगामी पञ्च उत्सवों धनतेरस; नरक चतुर्दशी/यम दीपावली; दीपावली; अन्नकूट; गोवर्धन पूजा/ भैया दूज अर्थात अन्धकार पर प्रकाश के विजय पर की हार्दिक शुभकामनाएँ। रोशनी का पर्व दीपावली सनातन धर्म का प्राचीन पर्व है। यह प्रतिवर्ष कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। इस पर्व के साथ अनेक धार्मिक, पौराणिक एवं ऐतिहासिक मान्यताएँ जुड़ी हुई हैं। यह पर्व भगवान श्रीराम के लंकापति रावण पर विजय हासिल कर, चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके अयोध्या लौटने की खुशी में मनाया जाता है। नरक चतुर्दशी

दीपदान की विशेष प्रथा है, जो यमराज के लिये किया जाता है। यह त्यौहार नरक चौदस या नरक चतुर्दशी के नाम से भी प्रसिद्ध है। मान्यता है कि कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन प्रातः काल तेल लगाकर अपामार्ग (चिचड़ी) की पत्तियाँ जल में डालकर स्नान करने से नरक से मुक्ति मिलती है तथा विधि-विधान से पूजा करने वाले व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो स्वर्ग को प्राप्त करते हैं। दीपावली को एक दिन का पर्व कहना न्योचित नहीं होगा। इस पर्व का जो महत्व और महात्मय है, उस दृष्टि से भी यह काफी महत्वपूर्ण पर्व व हिन्दुओं का त्यौहार है। यह पांच पर्वों की श्रृंखला के मध्य में रहने वाला त्योहार है। दीपावली से दो दिन पहले धनतेरस फिर नरक चतुर्दशी या छोटी दीपावली फिर दीपावली और गोवर्धन पूजा और फिर भैया दूज का त्योहार होता है। नरक चतुर्दशी को छोटी दीपावली भी कहते हैं; क्योंकि दीपावली से एक दिन पहले, रात के वक्त उसी प्रकार दीये की रोशनी से रात के तिमिर को प्रकाश पुँज से दूर भगा दिया जाता है, जैसे दीपावली की रात को। इस रात दिये जलाने की प्रथा के सन्दर्भ में कई पौराणिक कथाएँ और लोकमान्यताएँ हैं। एक कथा के अनुसार आज के दिन ही भगवान श्री कृष्ण ने अत्याचारी और दुराचारी नरकासुर का वध किया था और सोलह हजार एक सौ कन्याओं को नरकासुर के बन्दीगृह से मुक्त कर उन्हें सम्मान प्रदान किया था।

 

कार्तिक माह अर्थात पूर्णिमान्त की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन समुद्र-मन्थन के समय भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे; इसलिये इस तिथि को धनतेरस या धनत्रयोदशी के नाम से जाना जाता है। भारत सरकार ने धनतेरस को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में भी मनाने का निर्णय लिया है। जैन आगम में धनतेरस को \’धन्य तेरस\’ या \’ध्यान तेरस\’ भी कहते हैं। भगवान महावीर इस दिन तीसरे और चौथे ध्यान में जाने के लिये योग निरोध के लिये चले गये थे। तीन दिन के ध्यान के बाद योग निरोध करते हुये दीपावली के दिन निर्वाण को प्राप्त हुये थे; तभी से यह दिन धन्य- तेरस के नाम से भी प्रसिद्ध हुआ। धन्वन्तरि जब प्रकट हुए थे तो उनके हाथो में अमृत से भरा कलश था। भगवान धन्वन्तरि चूँकि कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिये इस अवसर पर बर्तन या चाँदी या अन्य आभूषण खरीदने की भी परम्परा है। चाँदी खरीदने के पीछे यह कारण माना जाता है कि यह चन्द्रमा का प्रतीक है, जो शीतलता प्रदान करता है और मन में सन्तोष रूपी धन का वास होता है। सन्तोष को सबसे बड़ा धन कहा गया है। जिसके पास सन्तोष है वह स्वस्थ है, सुखी है और वही सबसे धनवान है। भगवान धन्वन्तरि जो चिकित्सा के देवता भी हैं। उनसे स्वास्थ्य और आरोग्य की कामना की जाती है। एक बार यमराज से उनके एक दूत ने पूछा- यमराज! क्या कोई ऐसा उपाय नहीं है, जिससे मनुष्य अकाल मृत्यु से मुक्त हो जाय। दूत के इस प्रकार अनुरोध करने से यम देवता बोले, हे दूत! अकाल मृत्यु तो कर्म की गति है, फिर भी इससे मुक्ति का एक तरीका तुम्हें बताता हूँ। कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी की रात जो प्राणी मेरे नाम से पूजन करके दीपमाला दक्षिण दिशा की ओर भेंट करता है, उसे अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है। यही कारण है कि लोग इस दिन घर से बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीप जलाकर रखते हैं।

 

भाई- दूज भारत में मनाये जाने वाला एक बहुत ही महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन के अनुष्ठान और उत्सव ‘रक्षाबन्धन’ जैसे लोकप्रिय उत्सव के समान रहता है। इस विशेष अवसर पर भाई अपनी बहनों को कई उपहार देते हैं और बदले में बहनें अपने भाइयों को मिठाई खिलाती हैं। एक बुढ़िया थी, उसके सात बेटे और एक बेटी थी| बेटी की शादी हो चुकी थी। जब भी उसके बेटे की शादी होती, फेरों के समय एक नाग आता और उसके बेटे को डंस लेता और बेटे की गति हो जाती तथा बहू विधवा। इस तरह उसके छह बेटे मर गये। सातवें की शादी होनी बाकी थी और किस प्रकार उसकी बहन उसकी और अपने पूर्ववर्ती छः भाइयों की रक्षा करती है, इसका बड़ा मार्मिक वर्णन आता है और इसी कारण भाईदूज मनाया जाता है। इसी प्रकार अपने विशिष्ट पूजा समारोहों के लिये प्रसिद्ध सनातन धर्म में गोवर्धन पूजा के रूप में एक और लोकप्रिय और महत्वपूर्ण पूजा प्रथा है। गोवर्धन पूजा दीवाली पूजन के बाद तथा यह उत्सव भगवान इन्द्र पर भगवान कृष्ण की जीत के सम्मान में मनाया जाता है। यह दीपावली के पञ्च पर्व का चौथा दिन होता है और विक्रम सम्वत पञ्चाङ्ग की इस दिन शुरुआत होती है तथा अन्नकूट को पूजा जाता है। पौराणिक काल में और अब भी, जब वृन्दावन के लोगों द्वारा भगवान इन्द्र द्वारा की जाने वाली वर्षा की पूजा की जाती थी, तो उन्हें सन्तुष्ट करने और दिव्य आशीर्वाद पाने के लिये भव्य भोजन की पेशकश की जाती थी और है। साथ ही भगवान कृष्ण ने वृन्दावन के सभी विश्वासियों को सभी प्रकार के कष्टों के निवारणार्थ गोवर्धन पर्वत की पूजा करने और प्रार्थना करने का परामर्श दिया।

 

वर्तमान समय में पञ्च पर्वों का यह उत्सव निजी और सरकारी स्तर पर मनाने के अनेक निहितार्थ हैं। यह गरीबी उन्मूलन अर्थात अन्तिम व्यक्ति के उदय के लिये धनतेरस का आयोजन है; यह आपद काल में या अकाल समय में यमलोक से मुक्ति का उद्दाम मार्ग का प्रशस्त बिन्दु है; यह अन्धकार से प्रकाश या ऊर्जा के अजस्र प्रवाह की ओर जाने या हर्ष एवं उल्लास की जीजिविषा का प्रतिफलन है; यह भाई- बहन के माध्यम से आपसी प्रेम सौहार्द्र और एक दूसरे के संरक्षण तथा सम्वर्धन का सहज प्रकटीकरण है; यह लौकिक जगत द्वारा अलौकिक सत्ता के प्रति सहज आदर श्रद्धा के भाव रूप में गोवर्धन पूजा के रूप में भी प्रकट होता है। इस अर्थ में अयोध्या के दीपोत्सव आदि जैसे अनेक आयोजन भारत के समरस प्रगतिमान समाज का मार्ग प्रकाशित करते हैं और इसी रूप में इस पञ्च पर्व के समेकित आयोजन का भाव ग्रहण करना चाहिये।

 

डॉ कौस्तुभ नारायण मिश्र