हिजाब बुरका और वेलेन्टाइन डे

 

मिस्र, कभी बुतपरस्तों का देश था; जिसका विशाल साम्राज्य था और उसके पास अथाह सम्पदा थी। अलक्जेण्डर के सपनों का शहर अलक्जेंड्रिया यहीं स्थापित हुआ और विश्व की सबसे सम्पन्न लाइब्रेरी अलक्जेंड्रिया यहीं बनायी गयी। किन्तु लगभग 700 वर्ष बाद वह एक ऐसा देश बना, जहाँ की ज्ञान सम्पदा अर्थात लाइब्रेरी की पुस्तकों को 300 साल तक जलाया गया और मिस्र में 100 वर्ष तक जजिया वसूला गया। अर्थात एक ऐसा देश जिसके ज्ञान परम्परा तथा फेरोह से लेकर अलक्जेण्डर तक के वैभव काल को कुचल डाला गया और जजिया के नाम पर खूब लूट हुई। इसी कालखण्ड में एक देश था, स्पेन; जिस पर शमशीर से फतह प्राप्त की गयी और लगभग 500 वर्षों तक जजिया वसूलने का शासन रहा। यहाँ तक कि वहाँ की मुद्रा भी स्पेनी रियाल कही जाती थी। लेकिन बाद के 12वीं और 13वीं सदी में स्पेन धूल झाड़कर खड़ा हुआ तथा अगले ही 500 वर्षों में उसने आधी दुनिया को जीत लिया। इसी कारण और स्पैनिश साम्राज्य के फिलिप द्वितीय के लिये कहा गया, \’सन नेवर सेटस।\’ अमेरिका से लेकर फिलीपीन्स तक स्पैनिश झण्डा लहरा चुका था और इसी कारण यूरोप के फ्रांस, हालैण्ड और इंग्लैण्ड के बीच को दुनिया जीतने की होड़ चल पड़ी। दूसरी ओर मिस्र 100 वर्षों तक जजिया देकर मानसिक रूप से कमजोर हो उठा। लेकिन बाद में जब जजिया में ढील दी गयी, तो मिस्र वाले प्रसन्नता से इस्लाम कबूल कर लिये कि अब जजिया नहीं देना पड़ेगा।

इससे पहले जहाँ एक ओर स्पेन दुनिया जीत रहा था, वहीं मिस्र बन्दरगाहों से कमाकर इस्लाम को समृद्ध कर रहा था। बाद में नई सदी में जब संसार नयी करवट ले रहा था और अमेरिका जैसा देश मजबूत अस्तिव में आ चुका था। वह दौर जो तुर्की, उस्मानिया के टूटने और कमाल पाशा के उदय का था; उसी दौर में मिस्र में मोहम्मद कुतुब, हसन अली बन्ना और मौलाना मौदूदी का बनाया एक मुस्लिम ब्रदरहुड जन्म ले चुका था। यही छद्म विचारधारा आज तक दुनिया को डंस रही है। मिस्र जो वर्षों तक इसी वैचारिकी वाले इस्लामिक विनाश का केन्द्र रहा, जिसकी समस्त सभ्यता और ज्ञान को इस्लाम ने लूटा; वही मिस्र इस्लाम की इसी कट्टरपन्थी विचारधारा के मोहजाल में फंस चुका था। बहुधा मनोवैज्ञानिक स्टॉकहोम सिन्ड्रोम का नाम लेते हैं. लेकिन ध्यान से देखा जाय तो मिस्र का सिन्ड्रोम तो स्टॉकहोम सिन्ड्रोम से अधिक भयानक रहा। ऐसा नहीं था कि मिस्र से सुधारवादी प्रयास नहीं हुए। अनवर सादात मिस्र के राजनेता थे, जिन्होंने पहली बार इजरायल से इसके विनाशकारी परिणाम के सम्बन्ध में बात किया और इजरायल विवाद को समाप्त करना चाहा; लेकिन मिस्र में उनकी हत्या कर दी गयी। यह मानसिकता का ही अन्तर है कि, मिस्र अपने विनाशकों को ही अपना मान बैठा; जबकि  स्पेन ने प्रतिकार किया और संसार पर अपनी मौजूदगी जतायी। चूँकि हम ब्रिटिश कॉलोनी हैं इसीलिये हमें अंग्रेजी मिल गयी; लेकिन स्पैनिश भाषा कम प्रचलित नहीं है।
हमारे देश भारत में स्पेन और मिस्र की मानसिकता का एक परोक्ष युद्ध जारी है। एक ओर इस्लामिक कट्टरवाद है, जो \’हिजाब या किताब\’ में से हिजाब चुन रहे हैं और स्टॉकहोम सिन्ड्रोम के ग्रसित इसे प्रतिरोध बताकर समर्थन कर रहे हैं। दूसरी ओर स्कूल के भगवाधारी बच्चे भी हैं, जो इस्लामिक कट्टरपन्थ का प्रतिरोध कर रहे हैं। तो अब आप पर है कि क्या बनना चाहते हैं? यदि हिजाब के इस्लामिक जिहाद को समझना नहीं चाह रहे हैं, तो आप मिस्र सिन्ड्रोम से ग्रसित हैं।

यदि किसी को नैरेटिव की अपनी स्थिति को जाँचना है, तो प्रत्येक सनातनी और राष्ट्रवादी के लिये वेलेन्टाइन दिवस सबसे अच्छा उदाहरण है। आप अपने परिक्षेत्र में देखिये, इस दिवस को लेकर सबसे बड़ा खलनायक किसे बनाया जाता है? बजरंग दल, विहिप आदि या भारतीय मानसिकता के संगठनों या व्यक्तियों! इतना ही नहीं इनके खलनायक होने के सबसे अधिक चर्चे कौन करता है? भारतीय लोग ही करते हैं। इनको फिल्मों, टीवी सीरियलों, टीवी न्यूज मीडिया के साथ सोशल मीडिया पर सबसे अधिक निशाने पर रखा जाता है। अब इस हिजाब विवाद को ही देखिये, स्कूलों के अनुशासन तोड़ने और पढ़ाई से अधिक इस्लामिक कट्टरवाद पर कौन अड़ा है? यदि सांस्कृतिक पहचान हिजाब पहनना है, जिससे गैर-मर्द आपको देख ना पाएँ तो फिर अपनी अपनी संस्कृति की रक्षा कर रहे बजरंग दल आदि वाले, क्या अपनी संस्कृति के रक्षक नहीं कहे जायेंगे? लड़के-लड़कियाँ मास मीडिया के कहने पर वेलेन्टाइन दिवस मनाने निकल पड़ते हैं; जो मानव विकास में उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितनी शिक्षा! शिक्षा से अधिक वेलेन्टाइन डे भारी पड़ता है और ठीक वैसे ही उनके लिये शिक्षा पर मजहब भारी है। देश एक है;  लेकिन यह दो प्रकार की स्थितियाँ क्यों और कैसे हैं? नैरेटिव सेट करने के तरीके से! यह नैरेटिव बनाने की बहुत ही महीन रेखा है, जो आपकी तर्कशक्ति को मारकर किसी दूसरे के कट्टरपन्थ से प्रेम करना सिखा देती है। हिजाब को प्रगतिशील बताया जा रहा है और विहिप आदि दलों को खलनायक। ऐसा कैसे हुआ यह देखिये, यही वह नैरेटिव स्थापना है जो आपके प्रतिकार बोध को नष्ट करता है। तभी तो आप राम का उपहास उड़ाने पर ताली बजाते हैं और वे मेमे बनाने पर किशन भारवाड की हत्या कर देते हैं आप किसी फारूखी का शो निरस्त करा देने पर संघी हो जाते हैं और वे किसी सनातनी की हत्या करके भी पीड़ित हो जाते हैं। चौदह फरवरी को वेलेन्टाइन डे (झूठे प्रेम-दिवस) के रुप में भारत में भी मनाया जाता है; लेकिन ध्यान रहे इसी दिन एक ऐसे व्यक्ति बाबर का भी जन्म हुआ, जिसने पहले तो आक्रमण कर भारत को जमकर लूटा और बाद में अपने साम्राज्य की स्थापना कर भारत पर राज किया।

भारत में नैरेटिव सेट करने के मामले में भारतीय मानसिकता के लोग अनेक बार अबोध दिखायी पड़ते हैं। वे अपने समूह में चुपके से घुस जाने वाले विरोधी मानसिकता के अनुसार ही व्यवहार करने लगते हैं। सबको अपना बनाने के चक्कर में, जो वास्तव में अपना है, उसको किनारे करके आगे बढ़ने लगते हैं और लक्ष्य भटकने लगता है। अपनी विचारधारा के समाज, समिति, संस्था, संगठन को महत्व देने के बजाय, व्यक्तिवादिता के वशीभूत हो जाते हैं। व्यक्ति से ही समाज, समिति, संस्था, संगठन का निर्माण होता है; लेकिन व्यक्तिवादिता इसके लिये घातक होती है। पदानुक्रमिक अवस्था में बड़ों के प्रति आदर सत्कार और छोटों के लिये स्नेह प्रेम अपरिहार्य होता है। बड़े का अस्तित्व और मूल्य छोटों से होता है; उस छोटे से जो सच में आपकी विचार व्यवहार एवं कार्य के प्रति निष्ठा लगन एवं समर्पण हो। इसमें बड़ों का का यह उत्तरदायित्व बनता है कि वे अपनों को पहचाने, न कि समय एवं काल के अनुसार चापलूसी करने वालों पर भरोसा करने लगें! बड़ों की लोकप्रियता, छोटों के जनाधार पर निर्भर करती है; अन्यथा क्रमशः बड़ों की लोकप्रियता तिरोहित होती चली जाती है। ऐसी परिस्थिति में नैरेटिव सेट करने की शृंखलाबद्धता टूटती है, वह तन्त्र कमजोर पड़ता है। सर्वाधिक आवश्यकता है, जो अपना है, उसे अपना बनाये रखकर दूसरे की ओर हाथ आगे करना होगा; अन्यथा सामाजिक राजनीतिक आर्थिक सभी क्षेत्रों में संकट आ सकता है।

डॉ कौस्तुभ नारायण मिश्र

यथावत, नयी दिल्ली, 16- 28 फरवरी 2022 में प्रकाशित।