एक गणराज्य या गणतन्त्र सरकार का एक रूप है, जिसमें देश को एक \’सार्वजनिक विषय\’ माना जाता है; न कि शासकों की निजी संस्था या सम्पत्ति। एक गणराज्य के भीतर सत्ता के प्राथमिक पद विरासत में नहीं मिलते हैं अर्थात यह सरकार का एक रूप है जिसके अन्तर्गत राज्य का प्रमुख राजा नहीं होता। गणराज्य की परिभाषा का विशेष रूप से सन्दर्भ सरकार के एक ऐसे रूप से है, जिसमें व्यक्ति नागरिक निकाय का प्रतिनिधित्व करते हैं और किसी सम्विधान के तहत विधि के नियम के अनुसार शक्ति का प्रयोग करते हैं तथा जिसमें निर्वाचित राज्य के प्रमुख के साथ शक्तियों का पृथक्करण शामिल होता है। जिस राज्य का सन्दर्भ संवैधानिक गणराज्य या प्रतिनिधि लोकतन्त्र से है। अभी तक दुनिया के 206 सम्प्रभु राज्यों में से 159 अपने आधिकारिक नाम के हिस्से में गणतन्त्र या रिपब्लिक शब्द का उपयोग करते हैं। निर्वाचित सरकारों के अर्थ से ये सभी गणराज्य नहीं हैं, न ही निर्वाचित सरकार वाले सभी राष्ट्रों के नामों में \’गणराज्य\’ शब्द का उपयोग किया जा सकता है। भारतीय दृष्टि से गणतन्त्र और रिपब्लिक में अन्तर है, जिसकी कभी अलग से चर्चा की जायेगी। भले राज्य प्रमुख अक्सर यह दावा करते हों कि वे \’शासितों की सहमति\’ से ही शासन करते हैं, लेकिन व्यवहार में प्रायः ऐसा नहीं होता और सदैव ऐसा सम्भव भी नहीं होता। इसी कारण रिपब्लिक शब्द और प्रयोग को लेकर सिद्धान्त एवं व्यवहार के भेद की चर्चा होती है। नागरिकों को अपने स्वयं के नेताओं को चुनने की वास्तविक क्षमता को उपलब्ध कराने के उद्देश्य से प्रतिनिधि चुनने की व्यवस्था सम्विधान में होती है। लेकिन चुनाव के यथार्थ रूप और चुनाव के यथार्थ प्रतिफल का भेद रिपब्लिक और लोकतन्त्र, दोनों पर प्रश्न खड़ा करता है।
गणराज्य का आशय \”गण\” जनता, \”राज्य\” शासन से है। एक ऐसा देश होता है जहाँ के शासनतन्त्र में सैद्धान्तिक रूप से देश के सर्वोच्च पद पर आम जनता में से कोई भी व्यक्ति पदासीन हो सकता है। इस तरह के शासनतन्त्र को गणतन्त्र (गण अर्थात समूची जनता, तन्त्र अर्थता प्रणाली या जनता द्वारा नियन्त्रित प्रणाली) कहा जाता है। लोकतन्त्र या प्रजातन्त्र इससे अलग होता है। लोकतन्त्र वो शासनतन्त्र होता है, जहाँ वास्तव में सामान्य जनता या उसके बहुमत की इच्छा से शासन चलता है। आज विश्व के अधिकांश देश गणराज्य हैं और इसके साथ-साथ लोकतान्त्रिक भी। अपना भारत भी स्वयः एक लोकतान्त्रिक गणराज्य है। उदाहरण के लिये फ्रांस एक गणराज्य है, जो लोकतन्त्र नहीं है। हर गणराज्य का लोकतन्त्र होना अवश्यक नहीं है। तानाशाही, जैसे हिटलर का नाजीवाद, मुसोलीनी का फासीवाद, पाकिस्तान और कई अन्य देशों में फौजी तानाशाहीवाद; चीन, सोवियत संघ में साम्यवादी तानाशाहीवाद आदि गणतन्त्र हैं; क्योंकि उनका राष्ट्राध्यक्ष एक सामान्य व्यक्ति होता रहा है। लेकिन इन राज्यों में लोकतान्त्रिक चुनाव नहीं होते, जनता और विपक्ष को दबाया जाता है, जनता की इच्छा से शासन नहीं चलता। दक्षिणी अमरीका के कई देश लोकतन्त्र हैं, लेकिन गणराज्य नहीं है। जैसे प्रत्येक गणराज्य का लोकतन्त्र होना अवश्यक नहीं है; वैसे ही प्रत्येक लोकतन्त्र का गणराज्य होना आवश्यक नहीं है। इसी प्रकार संवैधानिक राजतन्त्र, जहाँ राष्ट्राध्यक्ष एक वंशानुगत राजा होता है; लेकिन असली शासन जनता द्वारा निर्वाचित संसद चलाती है।
आधुनिक गणराज्यों की स्थापना इस विचार पर की गयी कि सम्प्रभुता लोगों के पास है। यद्यपि कि लोगों की श्रेणी से शामिल और बाहर किये गये लोगों के इतिहास में भिन्नता होती है; क्योंकि नागरिक स्वयं राज्य पर शासन नहीं करते हैं। प्रतिनिधियों के माध्यम से, गणराज्यों को प्रत्यक्ष लोकतंत्र से अलग किया जा सकता है। यद्यपि कि आधुनिक प्रतिनिधि लोकतन्त्र कुल मिलाकर बड़े गणराज्य हैं। गणतन्त्र शब्द को सरकार के किसी भी रूप में भी लागू किया जा सकता है; जिसमें राज्य का मुखिया वंशानुगत सम्राट न होता हो। गणतन्त्र की एक दूरगामी परिभाषा के अनुसार \’एक सम्प्रभु शक्ति द्वारा कई परिवारों द्वारा सही ढंग से आदेशित सरकार; जो उनकी चीजों, सामान्य जरूरत और चिन्ता से अवगत है, को गणतन्त्र कहना चाहिये। इसकी अवहेलना करने वाले को अत्याचारी कहना चाहिये; क्योंकि उनका उद्देश्य सामान्य भलाई नहीं बल्कि एक व्यक्ति का निजी लाभ होता है। सत्रहवीं और अट्ठारहवीं शताब्दी के दौरान, अस्सी वर्ष के युद्ध (1568-1648) से अमेरिकी क्रान्ति (1775-83) तक, युद्धों और क्रान्तियों की एक श्रृंखला में निरंकुश शासनों के बढ़ते प्रतिरोध और उनकी उथल-पुथल के साथ दुनिया में गणतन्त्र का अर्थ केवल सैद्धान्तिक रह गया। फ्रांसीसी क्रान्ति (1787-89) के पश्चात अर्थात घटनाओं के प्रतिफल स्वरूप, गणतन्त्र शब्द सरकार के एक रूप को नामित करने के लिये आया; जिसमें नेतृत्वकर्ता नेता को समय-समय पर एक सम्विधान के अन्तर्गत नियुक्त किया जाता है। इसके लोकतान्त्रिक निहितार्थों के बावजूद, बीसवीं शताब्दी में उन राज्यों द्वारा इस शब्द का दावा किया गया था, जिनके नेतृत्व में अधिकांश पारम्परिक राजाओं की तुलना में अधिक शक्ति का विलास और भोग किया गया था। जिसमें सैन्य तानाशाही जैसे कि अगस्तो पिनोशे के तहत चिली गणराज्य और डेमोक्रेटिक पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ कोरिया जैसे अधिनायकवादी शासन शामिल होते हैं।
यहाँ एक प्रश्न नायक, नायकवाद, अधिनायकवाद का भी आता है; जिसको उपरोक्त किसी पलड़े पर नहीं रखा जा सकता। इसको ऐसे समझना चाहिये, भारत में नेहरू- गाँधी परिवार या कांग्रेस पार्टी \’अधिनायकवादी\’ रही है। जबकि श्यामा प्रसाद मुखर्जी, अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर अबके नरेन्द्र मोदी जी तक नायकवादी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के हिस्सा हैं और इसी कारण इनके संगठन भारतीय जनता पार्टी को आपको नायकवादी कहना चाहिये। जब नेतृत्वकर्ता अपने को राज्य का स्वयंभू नायक घोषित करता या मान लेता है, तो वह अधिनायकवाद की तरफ चला जाता है। ठीक इसके विपरीत, जब नेतृत्वकर्ता अपने को राज्य का स्वयंभू नायक घोषित नहीं करता; बल्कि लोक या जनता उसको राज्य के नेतृत्वकर्ता को सहजता से नायक मानने लगती है; तक लोकतन्त्र में नायकवाद आता है। किसी भी लोकतन्त्र के लिये नायकवाद जितना ही लाभकारी होता है, अधिनायकवाद उतना ही खतरनाक। अधिनायकवाद, सरकार एवं संगठन सभी जगह निरंकुश शासन करने को प्रवृत्त करता है; जबकि नायकवाद, सरकार एवं संगठन में स्वयं पर अंकुश रखकर शासन करने को प्रेरित करता है। लोकतन्त्र या गणतन्त्र या गणतान्त्रिक लोकतन्त्र को नाजीवाद, फांसीवाद, सामन्तवाद, तनाशाहवाद बना देने की प्रक्रिया का नाम अधिनायकवाद है। जबकि लोकतन्त्र या गणतन्त्र या गणतान्त्रिक लोकतन्त्र को नाजीवाद, फांसीवाद, सामन्तवाद, तनाशाहवाद आदि से बचाये रखने की प्रक्रिया का नाम नायकवाद है; जहाँ व्यक्ति या मनुष्य या आदमी या आदमीयत के मूल्य का लोप नहीं होता है। भारत को स्वाधीन होने के बाद से माफिया तस्कर बन्दूक के साये में भ्रष्ट एसपी के कपड़े उतरवाता रहा है और खुद भी कपड़े उतारकर कहता है- तू नँगा है, तो तुझे कुत्ता भी नहीं पहचानेगा; लेकिन मैं नँगा ऐसे ही जाऊँगा, तब भी लोग मुझे पहचानेंगे; मेरा ब्राण्ड वर्दी या कपड़े का मोहताज नहीं है। यही पद्धति अधिनायकवाद को बनाये रखने के लिये राज्य का स्वयंभू नेतृत्वकर्ता नायक अपनाता है। इसी पद्धति के कारण भारत में गुटनिरपेक्षता एवं मिश्रित अर्थव्यवस्था की नीति अपनायी गयी। लेकिन भारत की भारतीयता की विशेषता है कि अब उससे उबर कर सही अर्थों में लोकतन्त्र की मजबूती की तरफ बड़ चला है।
डॉ कौस्तुभ नारायण मिश्र
