फटे जीन्स की मानसिकता

एक बार हमसे एक स्त्री- विमर्श के अज्ञानाधिपति ने कहा कि- \’पता नहीं क्यों, जो दिखाया जाता है, उसे ही लोग क्यों देखते हैं? जो नहीं दिखाया जाता है, उसे क्यों नहीं देखते हैं? मैं जो दिखाता हूँ, उसको नहीं, जो नहीं दिखाता हूँ, उसको देखने की कोशिश कीजिये।\’ मैंने कहा- इस कार्य के लिये तो दिव्य या अलौकिक दृष्टि की जरूरत पड़ेगी और यह कार्य आध्यात्म से जुड़ा है, आप इसमें विश्वास करते नहीं, फिर ऐसा क्यों कह रहे हैं। उन्होंने कहा कि, यही तो मार्क्सवाद साम्यवाद है और इसीलिये मुझको आपसे ऐसा कहना पड़ रहा है। उत्तराखण्ड के मुख्यमन्त्री तीरथ सिंह रावत के महिलाओं की रिप्ड या फटी हुई जीन्स को लेकर दिये बयान के बाद अकारण विवाद शुरू हुआ है। प्रिन्ट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया पर भी फटे हुये जीन्स को लेकर चर्चा हो रही है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस जीन्स को लेकर इतनी बातें हो रही हैं उसकी शुरुआत कब हुई थी? इसकी पृष्ठभूमि जानना आवश्यक है। जैसा कि मुख्यमन्त्री ने कहा- लड़कियों और औरतों को फटी हुई जीन्स में देखकर हैरानी होती है। उनके मन में यह सवाल उठता है कि इससे समाज में क्या सन्देश जायेगा। प्रतिक्रिया स्वरूप कुछ लड़कियाँ और महिलाएँ तो रिप्ड जीन्स पहनें हुये अपनी तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर दिखा रही हैं। वैसे तो जीन्स पहनने का चलन दुनिया में 1869-70 में अर्थात मोहनदास करमचन्द गाँधी जी के जन्म के वर्ष से शुरू हो गया था। जर्मन बिजनेसमैन लोएब स्ट्रॉडस ने इसे डिजाइन किया और आगे चलकर उसने अपना नाम बदलकर लेविस रख लिया, जो डेनिम ब्राण्ड का संस्थापक बना। लेकिन फटी जीन्स का चलन सामान्य जीन्स के लगभग 100 वर्ष बाद अर्थात 1970 में अस्तित्व में आया। इससे पहले अगर कोई कटी-फटी जीन्स या फटे- कटे अन्य कपड़े भी पहननता था तो उसका या तो मजाक उड़ाया जाता था या फिर उसे गरीब समझा जाता था। लेकिन 1970 के बाद फटे जीन्स का चलन और फैशन बन गया। लोग अब खुद को फैशनेबल दिखाने के लिये अपनी जीन्स खुद ही घुटने के पास फाड़कर पहनने लगे थे। बाद में जीन्स बनाने वाली कम्पनियों ने भी फटे जीन्स बनाने का कारोबार आरम्भ कर दिया। ऐसे फटे जीन्स को डिस्ट्रेस्ड जीन्स भी कहा जाता है। इक्कीसवीं सदी का यह सबसे लोकप्रिय फैशन ट्रेण्ड के रूप में जाना और उपयोग किया जाने लगा है। वास्तव में फैसन उसे कहते हैं, जिसका मूल्याँकन उचित- अनुचित या अच्छे- बुरे से नहीं या सुन्दरता- फूहड़ता से नहीं, दिखावे एवं नकल पर आधारित होता है।

रिप्ड या फटी हुई जीन्स की संस्कृति का आरम्भ पंक या पॉप काल में शुरू हुआ था। पॉप संस्कृति की वजह से अनेक रॉकस्टार जैसे बीटल्स, रैमोन्स आदि ने इसे पूरी दुनिया में प्रसिद्ध कर दिया। समाज के प्रति अपने गानों के जरिये गुस्सा दिखाने के लिये इन्होंने फटी हुई जीन्स पहना। धीरे-धीरे यह फैशन में आ गया। इसको ऐतिहासिक बनाने और कहानी गढ़ते हुये अनेक विदेशी फैशन वेबसाइटस में कहा गया है कि- फटी जीन्स की संस्कृति 1990 में हार्डरॉक, हेवीमेलटरॉक और उसके दस वर्ष बाद ग्रूनजरॉक काल के दौरान भी चरम पर था। किन्तु सत्य यह है कि वर्ष 1970 के बाद 2010 में फटी जीन्स का ट्रेण्ड वापस आ गया। बीच में इसका चलन फीका पड़ गया था। लेकिन अब इसका नाम बदलकर डिस्‍ट्रेस्डर (घिसटकर या रगड़ खाकर या फटकर बना हुआ जीन्स) जीन्स हो गया। डीजल और बॉलमैन जैसे डिजाइनरों ने इसे पुनः बाजार में उतारा। कुछ सुपर मॉडल्स ने फटी जीन्स पहनकर अनेक अन्तर्राष्ट्रीय फैशन शो भी किये। उसके बाद तो जैसे युवाओं की यह पहली पसन्द बन गयी। वर्तमान में अनेक नामी- गिरामी या ब्राण्ड के नाम से ऐसे जीन्स बाजार में उपलब्ध हैं। फटी जीन्स का बाजार में इतने बड़े स्तर पर होने का एक कारण यह भी है कि आजकल जिस डेनिम का इस्तेमाल इसके लिये किया जा रहा है; उसमें छेदकर उसे उभाडू और दिखावटी आकर्षक रूप में आसानी से ढाला जा सकता है। पहले यह घुटनों से घिसी हुई होती थी, लेकिन अब यह जांघ, टखने से लेकर कमर से नीचे तक फटी हुई होती है। बट से फटी हुई जीन्स को \’बट रिप्ड जीन्स\’ के नाम से जाना जाता है। यह जानकर आश्चर्य होता है कि अब जो फटी हुई नामी- गिरामी जीन्स आ रही हैं; जिन्हें प्रायः सेलिब्रेटी पहने हुये दिखती हैं, उनकी कीमत पचास- पचास हजार रुपये तक है।

फटी जीन्स बनाने के लिये दो तरह से छेद बनाये जाते हैं। एक लेजर से और दूसरा हाथ से। सस्ती जीन्स में सस्ता डेनिम इस्तेमाल होता है और इसे फटा लुक देने के लिये लेजर का इस्तेमाल किया जाता है; लेकिन महँगे ब्राण्ड की जीन्स को फटा लुक देने के लिये कार्य करने वालों को हाथों से इनमें कट या छेद करना होता है। मुख्यमन्त्री की टिप्पणी पर सही और यथार्थ नहीं, फिल्मी जीवन जीने वाले लोगों ने प्रतिक्रिया दिया और कहा कि- \’मुख्यमन्त्री को अपनी मानसिकता बदलनी चाहिये।\’ लेकिन फिल्मी लोगों ने यह नहीं कहा कि, किस मानसिकता के आधार पर फटे कपड़े या फटी जीन्स या फाड़कर कपड़े पहने जाते हैं? जानबूझकर जीन्स या कोई भी कपड़ा फाड़कर क्यों पहना जाता है? उसके पीछे कौन सी मानसिकता या ज्ञान या विज्ञान या समझ या योग्यता छिपी हुई रहती है? इस तरह के प्रश्नों का उत्तर फिल्मी लोग या फटे जीन्स के पक्ष में वकालत करने वाले लोग कुछ नहीं बोल और बता रहे हैं! क्यों! फटे कपड़े या जीन्स या फाड़कर पहने जाने वाले कपड़े अच्छी मानसिकता के परिचायक हैं; यह कहाँ लिखा है और लिखा तो किसने किस आधार पर लिखा है? राजनीति से लेकर फिल्म जगत और सोशल मीडिया यूजर्स तक, कुछ लोग सम्बन्धित मुख्यमन्त्री पर निशाना साध रहे हैं। एक फिल्मी महिला ने कहा कि- \’पहले वे अपना पद सम्भालें, अभी-अभी मुख्यमन्त्री बने हैं और महिलाओं पर टिप्पणी करना बन्द करें।\’ जैसे लगता है कि महिलाएँ कोई आसमानी चीज हैं, जो सृष्टि प्रकृति समाज और दुनिया से अलग हैं। जिन पर बात करने का किसी को कोई अधिकार नहीं है? आखिर किसी को भी सहज रहने में हर्ज क्या है? एक फिल्मी महिला ने कहा कि- \’इस तरह की मेंटालिटी के लोग जो कपड़ों से महिलाओं को जज करते हैं, वे लोग महिलाओं के प्रति गलत मानसिकता को बढ़ावा दे रहे हैं।\’ उस फिल्मी और बनावटी महिला से किसी को पूछना चाहिये कि, किसी को भी जज किस आधार पर करना चाहिये? पहनावे से? खानपान से? रहन-सहन से? बोली भाषा से? आचार- विचार से? आदि! अथवा नंगेपन से? अपशब्दों के प्रयोग से? बड़ों को अपमानित करने से? शराब के नशे में नाली में लोटने से? बाजार में पशु की तरह शारीरिक सम्बन्ध बनाने से? नंगा होकर नांचने से? आदि! जो लोग मुख्यमन्त्री की बात को गलत कह रहे हैं, उनको इन प्रश्नों के उत्तर देने चाहिये! क्या उनके पास इन प्रश्नों के उत्तर हैं?

कुछ गैर- जिम्मेदार लड़कियों और लड़कों का कहना है कि- \’हमारे कपड़ों को बदलने से पहले अपनी मानसिकता बदलिये।\’ यहाँ पर केवल यही बात हैरान करने वाली है कि समाज को कैसा सन्देश दिया जा रहा है। मुख्यमन्त्री के सुझावपरक बात पर कुछ मुट्ठी भर सिरफिरी लड़कियाँ सोशल मीडिया पर फटी जीन्स पहने हुए अपनी फोटो भी शेयर कर रही हैं और बता रही हैं कि वे ऐसे कपड़े पहनकर काफी गर्व महसूस करती हैं। इस मुहिम में बॉलीवुड सेलेब्स तो खुलकर हिस्सा ले ही रहे हैं, कई महिला नेता भी उत्तराखण्ड के मुख्यमन्त्री के बयान के खिलाफ बोली हैं। ज्ञात हो कि जिस बयान पर इतना बवाल है वह सीएम ने बीते माह के अन्तिम मंगलवार को एक कार्यक्रम में देते हुए कहा था- \’आजकल महिलाएँ फटी जीन्स पहनकर चल रही हैं, क्या ये सब सही है? ये कैसे संस्कार हैं? बच्चों में कैसे संस्कार आते हैं? ये अभिभावकों पर निर्भर करता है। रावत की पत्नी रश्मि रावत ने कहा है कि- \’मुख्यमन्त्री ने जिस समूचे सन्दर्भ में यह बात कहा है, उसका वर्णन नहीं किया जा रहा है। महिलाओं की भागीदारी समाज और देश के निर्माण में अभूतपूर्व है। हमारे देश की महिलाओं के कन्धों पर ही यह जिम्मेदारी है कि वह हमारी सांस्कृतिक धरोहर को बचाएँ, हमारी पहचान को बचाएँ, हमारी वेशभूषा को बचाएँ।\’ जो लोग फटी जीन्स को देखने की मानसिकता पर सवाल खड़े कर रहे हैं; उनको स्वयं फटे जीन्स के पहनने की सड़ी हुई मानसिकता पर गम्भीर होना चाहिये। यहाँ केवल फटे जीन्स से ही नहीं, फटे हुए कपड़ों और फटी हुई मानसिकता का भी सवाल है? सवाल यह है कि कोई किसी चीज को खोलता क्यों है? कोई किसी चीज को दिखाता क्यों है? कोई किसी चीज को दिखाना क्यों चाहता है? क्या सभ्य समाज में यह तय नहीं करना चाहिये कि हम क्या दिखाएँ और क्या न दिखाएँ? कोई अपनी मूल्यवान चीज लॉकर में क्यों रखता है? क्योंकि चोरी न हो। कोई अपनी कम मूल्यवान चीज खुले में क्यों छोड़ देता है? क्योंकि उसके चोरी की सम्भावना नहीं रहती है। यह कैसी मानसिकता है कि हम अपनी वस्तु को मूल्यवान समझकर लॉकर में रखते हैं; लेकिन अपनी इज्जत को मूल्यहीन समझकर सरेआम बाजार में दिखाते हैं? क्या यह सड़ी हुई मानसिकता नहीं है? क्या हमें मान लेना चाहिये कि हमारे शरीर के अंग मूल्यहीन हैं और उसके चोरी की कोई सम्भावना ही नहीं होगी? किसी चोर को भी मौका तभी लगता है, जब हम उसे चोरी का अवसर उपलब्ध कराते हैं और जानबूझकर चोरी का अवसर उपलब्ध कराना तो चोरी को प्रश्रय देना हुआ! फटे जीन्स की मानसिकता से चोर हतोत्साहित नहीं, उत्साहित होते हैं। इसलिये मुख्यमन्त्री का और ऐसे किसी भी व्यक्ति की उक्त बात का बहुत मूल्य है और विचारणीय बात कहा है।

ज्ञात हुआ है कि इसी मुख्यमन्त्री ने एक और कार्यक्रम में कहा था कि- \’एक बार जब मैं जहाज में बैठा तो मेरे बगल में एक बहनजी बैठी हुईं थीं। मैंने उनको देखा तो नीचे गमबूट पहनी थीं; जब ऊपर देखा तो घुटने फटे हुए थे; हाथ देखे तो कई कड़े पहनी हुई थीं। जब घुटने देखे और साथ में दो बच्चे दिखे तो, मेरे पूछने पर पता चला कि उस बहन जी के पति जेएनयू में प्रोफेसर हैं और वो खुद कोई एनजीओ चलाती हैं। जो बहन जी एनजीओ चलाती हैं, उनके घुटने दिखते हैं! वे समाज के बीच में जाती हैं। बच्चे साथ में हैं; क्या संस्कार देंगी और बच्चे उनसे क्या प्रेरणा ग्रहण करेंगे?\’ ऐसे ही फटे जीन्स वाले किसी सामान्य व्यक्ति को यदि फटे कपड़े में देख लें तो उसका मजाक उड़ायेंगी और घृणा करेंगी! क्या यह बुनियादी सवाल नहीं है? रावत के इस बयान पर खासा बवाल हुआ है कुछ राजनीतिक दलों की नेत्रियों और कुछ अभिनेत्रियों ने गन्दे तरीके से सोशल मीडिया पर रावत को ट्रोल किया और उनको अपशब्द कहा है; यह उन नेत्रियों और अभिनेत्रियों के ओछेपन और गन्दी मानसिकता का प्रमाण है। यही ओछापन ही महिला सशक्तिकरण एवं महिला सुरक्षा में बहुत बड़ी बाधा है। दुनिया में बुराइयों के खिलाफ जनआक्रोश पैदा करने के संकेत स्वरूप फटी जीन्स पहनने का चलन ठंडे भागों में आया था। फटी जीन्स केवल फिल्मी टाइप हाईक्लास या केवल धनपशु सोसायटी के फैशन मात्र का हिस्सा भर नहीं है। दुनिया में पहली जीन्स 1870 में सामने आई थी। फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों के लिये ऐसे पैन्ट की जरूरत थी, जो आसानी से न फटे और सर्दी से रक्षा भी करे। इसलिये लोब स्ट्राइस ने और लेविस ने सबसे पहले नीले डाई की पहली जीन्स बाजार में उतारा। लेकिन 1970 से पहले तक सिर्फ गरीब लोग या मजदूर वर्ग ही जीन्स पहनते थे और जो इनमें भी अतिशय गरीब लोग थे, वे छोड़े हुये या आंशिक रूप से फट चुके जीन्स पहनकर काम चलाते थे; क्योंकि वे नयी नहीं खरीद सकते थे। पंक बैण्ड का 1977 में तेजी से चलन बढ़ा था। यह एक संगीत शैली है। इसमें तेज-तर्रार छोटे-छोटे गीतों को इस्तेमाल किया जाता था और इसका उद्देश्य राजनीतिक, सामाजिक और जीव-जन्तुओं के हितों को उठाना एवं समस्याओं को उजागर करना था। इस बैण्ड के लोग भी फटा जीन्स पहनते थे। यानी फटा जीन्स विरोध का, गरीबी का, सर्दी से रक्षा का एक जरिया था। आजकल फटा जीन्स तथाकथित उच्च जीवन शैली जीने वालों के ऊँचे जीवन स्तर को दिखाने का एक साधन हो गया है।

तृणमूल कांग्रेस की एक महिला सांसद ने उत्तराखण्ड के मुख्यमन्त्री के लिये अपशब्दों का सोसल मीडिया पर प्रयोग किया है। उक्त सांसद के नंगेपन की मानसिकता को यह गाली उजागर करती है। कुछ लोग कहते हैं कि, हम क्या खायें? क्या पहनें? कैसे रहें? कहाँ रहें? यह हमारी मर्जी है, जैसे चाहेंगे, वैसे रहेंगे करेंगे! इसमें किसी को कोई दखल नहीं देना चाहिये। निश्चित रूप से यह फूहड़ और गन्दी मानसिकता है। हम एक सामाजिक प्राणी हैं; हम पशु नहीं है; हम स्वतन्त्र हैं, स्वक्षन्द नहीं हैं। हमारे प्रत्येक गतिविधि एवं कार्य- व्यवहार का हमारे परिवार, हमारे परिवेश, हमारे समाज, हमारे देश पर प्रभाव पड़ता है और हम भी उससे प्रभावित होते हैं। आप पर्वत पर रहें और उसका प्रभाव आप पर न हो! आप मैदान में रहें और उसका प्रभाव आप पर न हो! आप पठार पर रहें और उसका प्रभाव आप पर न हो! आप वर्फ पर रहें और उसका प्रभाव आप पर न हो! आप झील झरना नदी तालाब आदि में रहें और उसका प्रभाव आप पर न हो, यह कैसे सम्भव है? इसलिये हमारे कार्य- व्यवहार, रहन- सहन, खान- पान पर मेरे परिवार, मेरे समाज, मेरे देश की निगरानी आवश्यक है और उसे उसको नियन्त्रित, नियमित, संयमित करने का पूरा अधिकार है। इसके लिये किसी के भी परिवार, समाज, देश को स्वाभाविक रूप से इसका अधिकार होना ही चाहिये। पुरुष और स्त्री को बराबर करने की बात करने वाले, क्या स्त्री- पुरुष की संरचनागत बराबरी कर सकते हैं? क्या प्रकृति के निर्माण और निर्माण प्रक्रिया को चुनौती दे सकते हैं? क्या चुनौती देने का प्रयत्न करना चाहिये? चुनौती देने का परिणाम क्या पर्यावरण ह्रास और विनाश का कारण नहीं बन रहा है? सवाल यह जरूर है कि, विनाश और ह्रास का उत्तरदायित्व किसका है? इसका दो उत्तर है, एक- सबका समान उत्तरदायित्व है और वह उत्तरदायित्व प्रकृति या सृष्टि द्वारा निर्धारित है। जिसका जितना अधिक अधिकार है, उसका उतना ही अधिक कर्तव्य भी है। दो- उत्तरदायित्व उसका है जो श्रेष्ठ है, जो योग्य है, जो काबिल है, जो लायक है, जिसमें बड़कपन है। अब तय यह करना है कि, स्त्री और पुरुष में आप श्रेष्ठ, योग्य, काबिल, लायक, बड़ा किसको मानें और किसको मानना चाहिये? इसका उत्तर है, जिसके अन्दर सृजन या निर्माण की जितनी ही अधिक शक्ति है; वही श्रेष्ठ, योग्य, काबिल, लायक और बड़ा है। स्त्रियों में यह सामर्थ्य प्रकृति ने पुरुषों की तुलना में बहुत अधिक दिया है। इसलिये संस्कार की अपेक्षा स्त्रियों से स्वाभाविक रूप से अधिक है! इसलिये स्त्रियों को संस्कार की और व्यक्ति निर्माण की प्राथमिक पाठशाला समझा जाता है और समझा जाना चाहिये। इसीलिये उनको संस्कार सभ्यता एवं संस्कृति के निर्वाह का व्यापक उत्तरदायित्व है। बिगड़ने का हक और अधिकार किसी को भी नहीं है। जो भी स्त्री या पुरुष बिगड़ेगा उसे माता- पिता, परिवार, समाज, देश ठीक करेगा और नहीं कर पायेगा तो प्रकृति या सृष्टि या नियति उसे ठीक कर देगी; वह नियति, जिसने स्त्री को स्त्री और पुरुष को पुरुष बनाया है।

वास्तव में समस्या यहाँ से आयी कि, स्त्री- विमर्श के नंगे एवं गरीब मानसिकता वालों ने स्त्री समाज के कार्य को छोटा और पुरुष समाज के कार्य को बड़ा बताते और समझाते हुये, स्त्री और पुरुष के बीच एक ऐसी खाई पैदा कर दिया कि, ये दोनों एक दूसरे के सहयोगी होने की अपेक्षा एक दूसरे के विरोधी होते गये और होते जा रहे हैं। फटा जीन्स इसका प्रमाण है। अब देखिये रोटी बनाने या भोजन बनाने एवं कराने के कार्य को सबसे छोटा बताया गया! जो कि जीवन का सबसे मूल्यवान एवं अनिवार्य कार्य है। जीवन में जो भी व्यक्ति स्त्री या पुरुष जो भी कार्य करता है; सबसे पहले किसके लिये? उत्तर है, भोजन के लिये! फिर किसलिये करता है? वस्त्र के लिये! फिर किसलिये करता है? आवास के लिये! पहला उद्देश्य शरीर को पोषित करने के लिये तथा दूसरा एवं तीसरा उद्देश्य मूल्यवान चीजों को सुरक्षित, संरक्षित आदि करने के लिये होता है। पोषण एवं संरक्षण दो अनिवार्य एवं मूल्यवान कार्य हैं; लेकिन मूर्खतापूर्ण विमर्श ने इन्हें ही तुक्ष और छोटा बताना शुरू कर दिया! जो श्रेष्ठ है, वही इन तीनों का ठीक- ठीक निर्वहन कर सकता है। अब कोई कहे कि, हमें मनुष्य नहीं, पशुवत रहना है; समाज में नहीं, जंगल में रहना है; सभ्य नहीं, असभ्य रहना है; तो यह उसकी मर्जी। फिर उसको अपने आपको असामाजिक एवं पशु घोषित कर देना चाहिये। श्रेष्ठता और सुन्दरता कभी भी स्वक्षन्दता एवं दूसरे को अपना प्रतिस्पर्धी या विरोधी बना लेने से नहीं आती है। श्रेष्ठता एवं सुन्दरता के लिये जरूरी है कि हम संयम रखें एवं दूसरे को प्रेम करें, परस्पर पूरकता का भाव लाएँ और यह स्त्री- पुरुष दोनों को समान रूप से करना चाहिये। स्त्री- पुरुष एक दूसरे के प्रतिद्वन्दी नहीं, एक दूसरे के सहयोगी हैं। एक सवाल यह भी है कि- अच्छे या बुरे का भेद, क्या पुरुष और स्त्री का भेद है? उत्तर है, नहीं। अच्छा और बुरा होना व्यक्ति- व्यक्ति की मानसिकता और कार्य- संस्कृति पर निर्भर करता है। स्त्रियों में भी श्रेष्ठ एवं पतित होते हैं और पुरुषों में भी श्रेष्ठ एवं पतित होते हैं। इसलिये फटे जीन्स या उघाड़ी शरीर देखना बुरी मानसिकता नहीं है; बुरी और गरीब मानसिकता है, महलों में रहकर फटे जीन्स पहनना और इसलिये पहनना कि हमारी शरीर दिख सके। इसलिये मुख्यमन्त्री का बयान लज्जावान, शीलवान बयान और अच्छी मानसिकता है। उनकी बात का विरोध करने लज्जाहीन, शीलहीन और सड़ी मानसिकता है।

(विद्या भारती की पत्रिका \’सृष्टि सम्वाद भारती\’ लखनऊ के मई 2021 के अंक में प्रकाशित।)

डॉ कौस्तुभ नारायण मिश्र