तीसरे विश्वयुद्ध की आहट

 

नाटो, रूस, अमेरिका, यूक्रेन तथा वैश्विक समीकरण के कारण यह प्रश्न उठ रहा है कि क्या रूस- यूक्रेन युद्ध के कारण तीसरा विश्वयुद्ध शुरू हो जायेगा? यह प्रश्न बहुत परिपक्व नहीं लगता; क्योंकि यह युद्ध केवल क्षेत्रीय या वैश्विक वर्चस्व का ही नहीं है, यह जाति, प्रजाति, भाषा के भेद का भी है; क्योंकि यह छद्म उत्तर आधुनिकता से उपजे नये प्रकार के पूँजीवादी एवं साम्यवादी वैचारिकी के बीच का भी है। इसलिये तीसरे विश्वयुद्ध की सम्भावना बहुत कम है। इसके तह में जाइये तो और भी अनेक प्रश्न खड़े होते हैं। एक बात जानना चाहिये कि यूक्रेन में बहुतायत आबादी यहूदी या रूसी है। यूक्रेन के जिस भाग पर रूसी रहते हैं, वहाँ स्वाभाविक रूप से रूस अपनी दखल चाहता है; इसी कारण यूक्रेन के दो राज्यों को रूस ने स्वतन्त्र मान्यता दे दिया। यूक्रेन मजबूत न हो, इसके लिये रूस ने उसको नाटो में शामिल न करने हेतु लगातार कोशिश किया है। यूक्रेन में शासनाध्यक्ष यहूदी हो या रूसी, चुनावों में यह महत्वपूर्ण मुद्दा होता है। वास्तव में आज का रूस सन 1990 से पहले सोवियत संघ या यूएसएसआर था। संवैधानिक तरीके से यह 15 स्वशासित गणतन्त्रों का संघ अर्थात यूनियन ऑफ ऑटोनामस रिपब्लिकन्स था। सोवियत संघ की स्थापना सन 1917 के दौरान रूस में हुए बोल्शेविक या रूसी क्रान्ति के बाद हुई। क्रान्ति के बाद रूस के सम्राट (जार) को अपदस्थ कर दिया गया और व्लादिमीर लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविक पार्टी ने सत्ता सम्भाल लिया। सत्ता सम्भालते ही लेनिन को तत्काल गृह युद्ध का सामना करना पड़ा। गृह युद्ध को बोल्शेविक विरोधी श्वेत मोर्चा कहते हैं। गृह युद्ध के दौरान बोल्शेविकों की लाल सेना ने ऐसे कई राज्यों पर अपना कब्जा जमाया; जिन्होंने रूस की क्रान्ति के दौरान जार के पतन का फायदा उठाते हुए खुद को स्वतन्त्र राष्ट्र घोषित कर दिया था। परिणामस्वरूप दिसम्बर 1922 को बोल्शेविकों की लाल सेना की पूर्ण जीत के बाद व्लादिमीर लेनिन ने 15 गणराज्यों को मिलाकर एक संघ का निर्माण किया, जिसका नाम सोवियत समाजवादी गणतन्त्र संघ (यूएसएसआर) या सोवियत संघ या सोवियत रूस रखा गया। सोवियत संघ के निर्माता लेनिन की वर्ष 1924 में मृत्यु के पश्चात जोसेफ स्टालिन ने सत्ता की बागडोर सम्भाला। सत्ता सम्भालने के बाद अपने शासनकाल में उन्होंने सोवियत संघ में बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण की शुरुआत कर एक केन्द्रीय आर्थिक व्यवस्था बनायी। कृषि, पेट्रोलियम पदार्थ, प्राकृतिक गैस और अन्य कारोबार को मिलाकर एक ग्रुप बनाया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि खेत किसानों की सम्पत्ति निजी न होकर राष्ट्र की सम्पत्ति हो गयी। केन्द्रीकृत अर्थव्यवस्था का इस्तेमाल द्वितीय विश्वयुद्ध में युद्ध लड़ने के लिये किया गया। बताया जाता है कि स्टालिन ने अपने शासनकाल में साम्यवादी पार्टी के सदस्यों, नेताओं और सोवियत संघ के समुदायों के साथ भी अत्याचार किया। सोवियत संघ में जोसेफ स्टालिन के शासनकाल में स्थापित कठोर, स्वकेन्द्रित प्रशासनिक प्रणाली के कारण साम्यवादी शासन की कमजोरियाँ सामने आने लगीं। इसका असर पूर्वी यूरोप के उन देशों पर भी पड़ने लगा, जहाँ साम्यवादी सरकार थी। फलतः पूर्वी यूरोपीय देशों की जनता अपनी राजनीतिक और आर्थिक संरचना से क्रमशः नाराज थी और पूर्वी यूरोपीय देशों में साम्यवादी सरकारों के प्रति अविश्वास बढ़ने लगा। इस अविश्वास ने जन-विद्रोह का रूप ले लिया; जिसका असर सोवियत संघ पर दिखाई दिया और यही उसके विघटन का क्रमशः कारण बनता चला गया। इसीलिये नेतृत्व- प्रतिनिधि/जनप्रतिनिधि – जनता के त्रिकट के बीच समन्वय अपरिहार्य होता है। बीच वाली कड़ी को कमजोर करना, नेतृत्व के लिये भविष्यगामी संकट को आमन्त्रित करता है।

 

मार्च 1985 को मिखाइल गोर्बाच्योव ने सोवियत संघ का नेतृत्व ग्रहण किया और इसी के साथ सोवियत साम्यवाद का सत्ता आधारित विखण्डनवाद शुरू हुआ। गोर्बाचेव ने रूस की आर्थिक दशा में सुधार तथा साम्यवाद को सकारात्मक दृष्टि से मजबूत बनाने के लिये अपनी विशिष्ट नीतियों की घोषणा किया, जिसे उस्कोरेनी (उदारीकरण) पेरेस्त्रोइका (निजीकरण) और ग्लास्नोस्त (खुलापन) के नाम से जाना जाता है। कुल मिलाकर गोर्बाचेव की नीतियों ने सोवियत संघ के विघटन की प्रक्रिया, जो स्टालिन से शुरू हुई थी, को पूरा किया। ऐसे में केन्द्र, जिसको अपनी मजबूती समझता है, वही उसकी कमजोरी का कारण बन जाता है। सत्ता सरकार पार्टी का जनता से समन्वय की एक कड़ी उसके प्रतिनिधि होते हैं; यदि उनको कमजोर करके किसी भी पार्टी की सरकार चलती है तो लम्बे समय तक, केन्द्र और जनता का साहचर्य सकारात्मक नहीं रह सकता। इस बीच की कड़ी को बहुत व्यवस्थित रखना लम्बी वैचारिकी सत्ता के लिये बहुत जरूरी होता है। गोर्बाचेव की तथाकथित जनतान्त्रिक नीतियों ने गणराज्यों के सोवियत संघ से अलग होने को मान्यता दे दिया; क्योंकि लागू करने वाले गोर्बाचेव एवं जनता के बीच बात को सम्भालने वाले या तो जनप्रतिनिधि नहीं थे या योग्य नहीं थे या कमजोर थे या निष्ठावान नहीं थे। अगस्त 1991 को केजीबी प्रमुख समेत आठ कम्युनिस्ट अधिकारियों ने मिलकर सोवियत नेता और रूस के तत्कालीन राष्ट्रपति मिखाइल सर्गेईविच गोर्बाचेव को सत्ता से व्यवस्थित रूप से बेदखल कर दिया और एक आपात समिति का गठन कर दिया गया। सत्ता से बर्खास्त कर देने के बाद उनको हिरासत में ले लिया गया। इससे पहले 8 दिसम्बर 1991 को रूस के तत्कालीन राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन ने सोवियत संघ के 15 घटक देशों में से तीन नेताओं के साथ मुलाकात किया। येल्तसिन से मिलने वालों में यूक्रेन के तत्कालीन राष्ट्रपति लियोनिड एम क्रावचुक और बेलारूस के नेता स्तानिस्लाव शुश्केविच शामिल थे; इन्होंने एक साझा बयान जारी किया।

 

सोवियत संघ के विघटन के लगभग दो दशक बाद रूस और यूक्रेन बीच तनाव सन 2013 के नवम्बर माह में उस समय शुरू हुआ, जब यूक्रेन के तत्कालीन राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच का उनके ही देश की राजधानी कीव में अमेरिका-ब्रिटेन के समर्थित प्रदर्शनकारियों ने विरोध करना शुरू कर दिया; जबकि उनको खुले तौर पर रूस का समर्थन हासिल था। यूक्रेन में अमेरिका और ब्रिटेन के समर्थित प्रदर्शनकारियों के भारी विरोध के कारण वहाँ के तत्कालीन राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविच को फरवरी 2014 में देश छोड़कर भागना पड़ गया। इससे नाराज होकर रूस ने दक्षिणी यूक्रेन के क्रीमिया पर कब्जा कर वहाँ के रूसी लोगों को अपना समर्थन देना शुरू कर दिया, जिन्हें कुछ लोग अलगाववादी कहते हैं। इन अलगाववादियों ने पूर्वी यूक्रेन के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया और सन 2014 के बाद रूस समर्थक और यूक्रेनी सेना के बीच यूक्रेन के डोनबास प्रान्त में संघर्ष शुरू हो गया। पहले भी जब 1991 में यूक्रेन सोवियत संघ से अलग हुआ था, तब भी कई बार क्रीमिया को लेकर दोनों देशों में टकराव हुआ था। इसके बाद खुद को मजबूत करने के लिये यूक्रेन ने हाल के दिनों नाटो से करीबी सम्बन्ध बनाना शुरू कर दिया। सन 1949 में तत्कालीन सोवियत संघ से निपटने के लिये उत्तरी अटलांटिक सन्धि संगठन (नाटो) बनाया गया था। यूक्रेन की नाटो से करीबी रूस को बुरी लगने लगी। इससे अमेरिका यूक्रेन के समर्थन में उतरकर सामने आ गया और उसने यूक्रेन में नाटो का ट्रेनिंग सेन्टर खोलने की योजना बना डाला। नाटो का प्राविधान है कि यदि कोई देश किसी तीसरे देश पर हमला करता है, तो नाटो के सभी सदस्य देश एकजुट होकर उसका मुकाबला करते हैं। रूस चाहता है कि नाटो अपना विस्तार न करे। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इसी माँग को लेकर यूक्रेन और पश्चिमी देशों पर दबाव डाल रहे थे। अमेरिका का समर्थन मिलने के बाद यूक्रेन नहीं माना और उसने डोनबास प्रान्त के नागरिक आबादी पर आक्रमण कर दिया। माना जाता है कि इस डोनबास प्रान्त में रूस समर्थक यूक्रेन की विरोधी आबादी रहती है। यूक्रेन की इस कार्रवाई का नतीजा यह रहा कि रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अमेरिका और पश्चिमी देशों की पाबन्दियों की परवाह किये बिना यूक्रेन पर आक्रमण कर दिया।

 

तीसरे विश्वयुद्ध की सम्भावना कम दिखने के पीछे भारत है। क्योंकि भारत न तो पूँजीवादी देश है, न साम्यवादी देश है और न ही इन दोनों का मिश्रित अर्थव्यवस्था वाला देश है; भारत स्वतन्त्र रूप से मानवतावादी, बसुधैव कुटुम्बकम, सर्वे भवन्तु सुखिनः वाला एकात्म मानववादी देश है। इसका न तो पूँजीवाद या साम्यवाद से टकराव है और न ही ये दोनों किसी मात्रा में इसमें शामिल हैं। इसलिये निम्नलिखित बातों पर ध्यान देना चाहिये। यदि कोई आपसे पूछे कि- आप न्याय के साथ खड़े हैं या मित्र के साथ? तो  स्वाभाविक रूप से तीन उत्तर बनते हैं। पहला- न्याय के साथ!, दूसरा- मित्र के साथ!, तीसरा- न्यायोचित मित्र के साथ खड़े होंगे! भारत के प्रधानमन्त्री जी के विषय में बार- बार यह कौतूहल बहुतों के मन में जाग्रत होता है कि, उपरोक्त पूरे प्रकरण पर भारत की भूमिका क्या है, क्या होगी, क्या नहीं होगी? क्योंकि प्रधानमन्त्री जी का ही स्टैण्ड देश का स्टैण्ड होगा। इस पूरे विषय में कोई ठीक- ठीक नहीं कह सकता कि, दोष रूस का है या यूक्रेन का या दोनों का! इस परिस्थिति में भारत की भूमिका घोषित रूप से सामने लाना भारत के लिये उचित नहीं है और कूटनीतिक एवं रणनीतिक रूप से भारत यही कर रहा है। भारत की जो भी भूमिका है, उसे दिखाने के बजाय, उस भूमिका के निर्वाह करने की आवश्यकता है। इस घटनाक्रम और इसकी परिणति आप केवल जाति, प्रजाति, भाषा, स्थान, यहूदी, रूसी दृष्टि से ही नहीं देख सकते और न ही यूक्रेन एवं रूस के वैचारिक संघर्ष और उस संघर्ष की पृष्ठभूमि में पड़े नाटो के सामीप्य की ही कहानी तक सीमित है। बल्कि यह लेनिन एवं स्टालिन और इनके गुरु कार्लमार्क्स के वैचारिक क्रिया से उपजे सोवियत संघ, उसके विखण्डन और आज के रूस- यूक्रेन संघर्ष के क्रम में समझना जरूरी है। रूस का यह केवल रूसी लोगों के एकीकरण, सोवियत संघ के पुनः एकीकरण का प्रयास मात्र नहीं है; रूस का यह प्रयास वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अपना वर्चस्व कायम करने के लिये भी है। इसी कारण संयुक्त राज्य अमेरिका और इसके माध्यम से कहीं न कहीं नाटो भी यूक्रेन के साथ खड़ा होने की भूमिका में है। इसीलिये यह लड़ाई कहीं न कहीं पूँजीवाद/उदारीकरण एवं कम्यूनवाद/मार्क्सवाद के बीच का भी संघर्ष दिखायी पड़ता है। विश्वयुद्ध छिड़ने, यूक्रेन के बने रहने, यूक्रेन के टूटने या यूक्रेन के अस्तित्व समाप्त होने की स्थिति में भारत की भूमिका निश्चित ही समेकित एवं सन्तुलित मार्ग निकलेगा। भारत इसमें सफल होगा, तय है।

 

डॉ कौस्तुभ नारायण मिश्र

 

यह लेख \’युगवार्ता\’, नयी दिल्ली के 01-15 मई 2022 के अंक में \’नजरिया\’ स्थायी स्तम्भ के अन्तर्गत प्रकाशित है।