विकास के जितने भी आयाम हैं, उनका सम्यक ध्यान रखकर ही, हम समग्र विकास की कल्पना कर सकते हैं। विकास में व्यक्ति एवं समाज की सुरक्षा; व्यक्ति एवं समाज की संरक्षण; व्यक्ति एवं समाज का भरण- पोषण; व्यक्ति एवं समाज का स्वास्थ्य; व्यक्ति एवं समाज की अर्थव्यवस्था; व्यक्ति एवं समाज के लिये सड़क एवं बिजली जैसी अवस्थापनात्मक सुविधाएँ; व्यक्ति एवं समाज की सभ्यता संस्कृति एवं संस्कार आदि सब जरूरी आयाम हैं। सबके लिये यह व्यवस्था करना, किसी भी कल्याणकारी राज्य का कर्तव्य होता है। उत्तर प्रदेश भारत का जनसंख्या के आधार पर सबसे बड़ा राज्य है। लखनऊ प्रदेश की प्रशासनिक व विधायी तथा प्रयागराज न्यायिक राजधानी है। आगरा, अयोध्या, कानपुर, झाँसी, बरेली, मेरठ, वाराणसी, गोरखपुर, मथुरा, मुरादाबाद और आर्यमगढ़ प्रदेश के अन्य महत्त्वपूर्ण शहर हैं। यह राज्य उत्तर में नेपाल व उत्तराखण्ड, दक्षिण में मध्य प्रदेश, पश्चिम में हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान तथा पूर्व में बिहार तथा दक्षिण-पूर्व में झारखण्ड व छत्तीसगढ़ से घिरा हुआ है। यह राज्य 2,38,566 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल में फैला हुआ है। यहाँ का मुख्य न्यायालय प्रयागराज में है। उत्तर प्रदेश का ज्ञात इतिहास लगभग 5000 वर्ष से अधिक पुराना है। इससे पूर्व और इस समय वैदिक सभ्यता का प्रारम्भ एवं विकास हुआ और उत्तर प्रदेश के मैदानी भाग में इसका जन्म हुआ। आर्यों का फैलाव सिन्धु नदी और सतलुज के मैदानी भागों से यमुना और गंगा के मैदानी क्षेत्र में आरम्भ से ही व्यापक रूप में था। आर्य दोआब अर्थात यमुना और गंगा के मैदानी भाग और घाघरा नदी क्षेत्र व्यापक रूप में रहते रहे हैं। इन्हीं आर्यों के नाम पर भारत देश का नाम आर्यावर्त या भारतवर्ष (भरत आर्यों के एक प्रमुख राजा थे) पड़ा। संसार के प्राचीनतम नगरों में से एक माना जाने वाला काशी अथवा वाराणसी नगर यहीं पर स्थित है। वाराणसी के पास स्थित सारनाथ का चौखण्डी स्तूप भगवान बुद्ध के प्रथम प्रवचन की याद दिलाता है। समय के साथ यह क्षेत्र छोटे-छोटे राज्यों में बँट गया या फिर बड़े साम्राज्यों, गुप्त, मौर्य और कुषाण का हिस्सा बन गया। सातवीं शताब्दी में कन्नौज गुप्त साम्राज्य का प्रमुख केन्द्र था।
उत्तर प्रदेश हिन्दू धर्म का प्रमुख स्थल रहा। प्रयाग के कुम्भ का महत्त्व पुराणों में वर्णित है। त्रेतायुग में विष्णु अवतार श्री रामचन्द्र जी ने अयोध्या में (जो अभी अयोध्या जनपद में स्थित है) में जन्म लिया। भगवान राम का चौदह वर्ष के वनवास में प्रयाग, चित्रकूट, श्रंगवेरपुर आदि का महत्त्व है। भगवान कृष्ण का जन्म मथुरा में और पुराणों के अनुसार विष्णु के दसम अवतार का कलयुग में अवतरण भी उत्तर प्रदेश के इसी हिस्से में आता है। काशी अथवा वाराणसी (कुछ लोग शास्त्रीय दृष्टि से इसको अलग- अलग भाग का नामकरण कहते हैं) में विश्वनाथ मन्दिर के शिवलिंग का सनातन धर्म के लिये विशेष महत्त्व रहा है। सनातन धर्म के प्रमुख ऋषि रामायण रचयिता महर्षि वाल्मीकि जी, रामचरित मानस रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी, महर्षि भरद्वाज जी। भारत और उत्तर प्रदेश का व्यवस्थित इतिहास काफी पुराना है, जब उत्तरी भारत में 16 महाजनपद श्रेष्ठता की दौड़ में शामिल थे। इनमें से सात वर्तमान उत्तर प्रदेश की सीमा के अन्तर्गत थे। बुद्ध ने अपना पहला उपदेश वाराणसी (बनारस) के निकट सारनाथ में दिया और एक ऐसे धर्म की नींव रखी, जो न केवल भारत में, बल्कि चीन व जापान जैसे सुदूर देशों तक फैला। बुद्ध को कुशीनगर में परिनिर्वाण (शरीर से मुक्त होने पर आत्मा की मुक्ति) प्राप्त हुआ था। इस राज्य पर शासन कर चुके इस काल के महान शासकों में चक्रवर्ती सम्राट महापद्मनन्द और उसके बाद उनके पुत्र चक्रवर्ती सम्राट धनानन्द जो नाई समाज से थे। सम्राट महापद्मानन्द और धनानन्द के समय मगध विश्व का सबसे अमीर और बड़ी सेना वाला साम्राज्य था।
इस काल के दौरान बौद्ध संस्कृति का उत्कर्ष हुआ। अशोक के शासनकाल के दौरान बौद्ध कला के स्थापत्य व वास्तुशिल्प प्रतीक अपने चरम पर पहुँचे। गुप्त काल के दौरान हिन्दू कला का अधिकतम विकास हुआ। हर्ष की मृत्यु के बाद राष्ट्रवाद अथवा हिन्दूवाद के पुनरुत्थान के साथ ही व्यवस्थित सामाजिक सांस्कृतिक आर्थिक विकास का मार्ग तीव्रता से आगे बढ़ा। इस पुनरुत्थान के प्रमुख रचयिता दक्षिण भारत में जन्मे शंकर थे, जो वाराणसी पहुँचे, उन्होंने उत्तर प्रदेश के मैदानों की यात्रा की और हिमालय में बद्रीनाथ में प्रसिद्ध मन्दिर की स्थापना किया। तबसे लेकर आज तक के इतिहास की यदि इस प्रदेश के भूगोल से साम्यता स्थापित करके पारदर्शी पार्श्वकाट बनाया जाय तो, सम्यक विकास, संशलिष्ट विकास, संधृत विकास, समग्र विकास का मार्ग स्वाभाविक रूप से मार्ग प्रशस्त होता है। किसी भी राष्ट्र, राज्य, प्रदेश की उत्तमता इस बात पर निर्भर करती है कि उस राष्ट्र, राज्य, प्रदेश का सामाजिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक क्या एक साथ सम्यक रूप से हो रहा है। विकास का अर्थ केवल स्थूल एवं वस्तुगत विकास से नहीं है; विकास स्थूल के साथ- साथ सूक्ष्म भी होता है; विकास वस्तुगत के साथ- साथ भावनात्मक भी होता है। इस प्रक्रिया में विकास को युगानुकूल और देशानुकूल बनाकर उपयोग करना होता है। इस आशय यह हुआ कि- जो स्वदेशी है, उसको युगानुकूल और जो अभारतीय है, उसे देशानुकूल बनाकर व्यवहार करना होता है। विकास से जुड़े सभी विचार व्यवहार कार्य को युगानुकूल और देशानुकूल बनाना, उत्तम प्रदेश बनाने के लिये आवश्यक ही नहीं अनिवार्य होता है। इस दृष्टि से वर्तमान उत्तर प्रदेश सरकार, उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने की दिशा में सतत सन्नद्ध है।
(16 से 31 दिसम्बर 2021 के यथावत, नयी दिल्ली के अंक में प्रकाशित)
डॉ कौस्तुभ नारायण मिश्र
